Friday, November 14, 2008

इछावर में करण सिंह के व्यवहार से उनका समाज हुआ कुपित, मेवाड़ा भी हैं नाराज

साढ़े चार साल से हमेशा कार्यकर्ताओं के सामने बीमार रहने वाले मंत्री करण सिंह अब वोट मांगने निकल पड़े

 

           सीहोर 13 नवम्बर (नि.सं.)। भाजपा के अभेद्य गढ़ इछावर में भाजपा की स्थिति आज नहीं बल्कि करीब एक  साल पूर्व से ही कमजोर आंकी जा रही है।  ऐसे में पूर्व में निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में लड़े बलवीर का बल अब कांग्रेस के झण्डे तले लड़ने से और बढ़ गया है। उधर इछावर नगर के नेताजी अभय मेहता की मार-पकड़ का विपरीत प्रभाव जितना कांग्रेस को पड़ेगा क्या उतना ही भाजपा को भी पड़ रहा है यह कहना अभी मुश्किल है लेकिन मेवाड़ा समाज के कुपित होने से भाजपा प्रत्याशी करण सिंह वर्मा को लेने के देने पड़ने की बातें अवश्य कही जा रही है।

      कुल मिलाकर साढ़े चार साल तक हाय मेरा हाथ दुख रहा हैं...तो कभी सीने में दर्द है...तो कभी अन्य बीमारी से स्वयं को दुखी-पीड़ित बताने वाले और काम से बचने वाले करण सिंह वर्मा आज भले ही स्वस्थ होकर वोट मांगने निकल पड़े हों लेकिन क्या उनकी राह आसान कोई नहीं मान रहा है।

      जिले की चारों विधानसभा सीटों में सबसे यादा सुरक्षित सीट भाजपा के लिये हमेशा इछावर रहती है। इछावर में खाती समाज के प्रत्याशी को भाजपा हमेशा मैदान में उतारती है। कहावत है कि खाती का बच्चा हाथ में कमल का फूल लेकर पैदा होता है, यही कहावत मेवाड़ा समाज के लिये प्रचलित है। इछावर में खाती समाज की बाहुल्यता भी है। हालांकि दूसरे  समाज आपस में मिलकर खाती समाज से बहुत अधिक हैं लेकिन वह आपस में मिल नहीं पाते और खाती समाज का भाजपा प्रत्याशी हमेशा विजयी हो जाता है।

      लेकिन इस बार जबसे करण सिंह वर्मा सत्ता में आकर मंत्री बने तब से ही इछावर में उनके विरोध में एक लहर-सी चल पड़ी है। पिछले ही चुनाव में खाती समाज के पूरे मत इन्हे नहीं मिल पाये थे। इसके अलावा वर्मा के वर्तमान हो गये स्वभाव के चलते कई जगह उनकी झड़प हो चुकी है। हाल ही में सतपीपलिया ग्राम में भी एक नुक्ते में मंत्री जी ने आपा खोकर झड़प कर डाली थी जिसका विपरीत असर पड़ा था। ऐसे विगत 5 साल में करीब 6-7 नुक्तों में मंत्री जी कहासुनी या लोगों की नाराजगी सामने आ चुकी है। खाती समाज में नुक्तों का बड़ा महत्व है और इन्ही नुक्तों से बड़ी-बड़ी हवाएं बनती और बिगड़ जाती हैं। कुल मिलाकर नुक्तों में हुई विरोधी स्थितियों को लेकर आज जब चुनाव शुरु हो गये हैं तो तरह-तरह के आंकलन बनने लगे हैं।

      दूसरा बड़ा वर्ग भाजपा के लिये हमेशा मेवाड़ा समाज रहता है, लेकिन चुनाव शुरु होने के साथ ही इछावर क्षेत्र के कई मेवाड़ा समाज के वजनदार लोग जो कभी खुलकर कांग्रेस का काम नहीं करते वह खुलकर कांग्रेस के पक्ष में काम करते नजर आ रहे हैं। इस दृष्ठि से मेवाड़ा वोट को पूरी तरह इस बार भाजपा का नहीं माना जा रहा है। इछावर में मेवाड़ा वोट बहुत बड़ी टूट-फूट के साथ प्रकट होगा।

      आंकड़ो के हिसाब से देखें तो करण सिंह वर्मा चुनाव लड़ने के पहले ही हार चुके हैं। क्योंकि पिछली बार हेमराज परमार सीधे कांग्रेस के प्रत्याशी थे जिन्हे 27 हजार मत मिले थे जबकि दमदार कांग्रेस के बागी व निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में बलवीर तोमर ने 26 हजार मत प्राप्त किये थे। दोनो के मिलाकर 53 हजार मत होते हैं और इछावर में करण सिंह वर्मा को करीब 45 हजार के आसपास मत प्राप्त हुए थे।

      इस हिसाब से यदि पिछले ही चुनाव में कांग्रेस में बगावत नहीं होती तो कांग्रेस की एक तरफा जीत सुनिश्चित थी। यहाँ यह बात भी काफी प्रभावी है कि वर्ष 2003 के चुनाव में पूरे प्रदेश सहित इछावर में भी कांग्रेस के कुशासन से जनता त्रस्त थी, और वह भाजपा को जिताना चाहती थी इसके बावजूद भाजपा कोई बहुत अच्छे मतों से नहीं जीतकर आई थी।

      मेवाड़ा समाज जो अक्सर भाजपा के पक्ष में नजर आता है। ऐसा पहली बार हो रहा है कि समाज के प्रभावी लोग खुलकर कांग्रेस के साथ काम करते नजर आ रहे हैं। कुछ लोग अभय मेहता से भी प्रभावित है।

      उधर अभय मेहता ने अवश्य कांग्रेस प्रत्याशी की नींद उड़ा कर रख दी है। जहाँ इछावर नगर में मेहता का प्रभाव से किसी को इंकार ही नहीं है वहीं सहकारी नेता के रुप में गांव-गांव बल्कि करण सिंह वर्मा के गृह ग्राम तक अभय मेहता की मार-पकड़ की बातें कही जा रही है। पिछले चुनाव में चूंकि हेमराज परमार कांग्रेस के प्रत्याशी थे और उन्हे बलवीर के कारण हारना पड़ा था इसलिये इस बार परमार समाज भी बलवीर से खफा है और अभय मेहता के पक्ष में भी आ सकता है।

      हालांकि बलवीर के लिये भी राह आसान नहीं है। जहाँ बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस के लिये रोड़े बिछाना विगत साल भर शुरु कर रखा है वहीं पिछली कांग्रेस से बगावत के कारण बलवीर से कांग्रेसियों की नाराजी और मेहता के खड़े हो जाने से बन रहे समीकरणों ने बलवीर को भी अनेक विचार करने के लिये मजबूर कर दिया है।