Sunday, March 9, 2008

आष्टा का गिरनार (जैन तीर्थ)

आस्थावान नगरी आष्टा में श्री नेमिनाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर का इतिहास अत्यंत ही रोचक तथ्यों से भरा हुआ है। सम्प्रति महाराजा के काल में आज से लगभग बाईस सौ वर्ष पूर्व इस मंदिर का जीर्णोध्दार हुआ था न कि निर्माण। देश के कई शासकों के समय भी यह अपनी भव्यता एवं अलौकिकता का परिचय देता रहा। समय गुजरता गया, शासकों ने इसे नुकसान पहुँचाने की कुचेष्ठा भी की। जिसके परिणाम स्वरुप समाज के बुध्दी प्रमुखों ने कुछ मूर्तियाँ सुरक्षा की दृष्टि से प्राचीन मंदिर के तलघर में स्थापित की। लेकिन कोई भी ऐसा पुख्ता सबूत देकर नहीं गये कि मंदिर के नीचे भी मूर्तियां हें। इसे हम संयोग कहें या अद्भुत घटना की हजारो साधु संतों के आवागमन के पश्चात भी किसी साधु साध्वी या श्रावक को यह आभास नहीं हो सका। लेकिन पूय पन्यास प्रवर श्री हर्षतिलक विजय जी म.सा. को ईश्वरीय तौर पर ऐसे संकेत या आभास हुआ कि इस प्राचीन मंदिर के नीचे भी मूर्तियाँ हैं। साधु भगवंत के अथक प्रयास और साहस से यह स्वप् साकार हुआ जिसे लोग मूर्तियां होने का स्वप् मान रहे थे। खुदाई आरंभ होने पर पता लगा कि वहाँ कई मूर्तियाँ विराजित हैं जिसे पूयश्री ने विशेष क्रिया मांगलिक विधि के माध्यम से श्रावकों द्वारा बाहर निकलाया। सबसे यादा भव्य और प्रभावी मूर्ति श्री शंखेश्वरपार्श्वनाथ प्रभु की है जिनके प्रभाव का वर्णन शब्दों में करना असंभव है। मूलनायक श्रीनेमिनाथ भगवान तो प्रकट प्रभावी हैं, आशा पूरण हैं। इतनी प्राचीन मूर्ति आज के युग में देखने और पूजने के लिये बहुत मुश्किल से उपलब्ध होती है। इसकी प्राचीनता की देश के जाने माने पुरातत्व वेत्ता श्री वाकणकर ने भी आष्टा प्रवास के समय पुष्टि की थी। मूलनायक श्रीनेमिनाथ प्रभु के दर्शन जब करते हैं तो ऐसा लगता है साक्षात प्रभु विराजमान हैं। प्रभु पूजा से सच्चे सुख की अनुभूति होती हैं। पापों का क्षय होता है। मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है। कईयों के मनोरथ सफल होते हैं। प्रथम बार दर्शन से ही जो आकर्षण और अलौकिकता की किरणें बिखरती हैं वे दर्शक का मनमोह लेती हैं और वह श्रीनेमिनाथ प्रभु का भक्त हो जाता है। साध्वी उमा भारती और कनकेश्वरी देवी तो बेहद प्रभावित हुईं।
इस मंदिर का जीर्णोध्दार पिछले लगभग 25 वर्षों से निरन्तर चल रहा है। कई बार कई तरह के चमत्कार हुए। जैसे श्वेत नाग देवता का प्रकट होना, आकाश से केशर की बरसात होना, प्रभु की मूर्ति से अमि झरना, इसके अतिरिक्त एक सबसे बड़ा प्रभाव जो देखने को मिला वह यह कि जबसे जीर्णोध्दार कार्य प्रारंभ हुआ नगर के हर समाज के हर घर की निरन्तर प्रगति हुई लोगों में धर्म की भावना प्रबल हुई साथ ही अधिक से अधिक धन को धर्म में समर्पित करने की भावना जाग्रत हुई।
इस मंदिर के निर्माण को सर्वोच्च मुकाम पर पहुँचाने का श्रेय परम पूय आचार्य श्री राज तिलक सू.म.सा. को हैं जिन्होने गुजरात विचरण के समय केवल मूर्ति के फोटो के दर्शन किये और उन्होने इसके निर्माण की पूरी जिम्मेदारी ली लोगों को अधिक से अधिक प्रेरित कर दान कराया और उन्ही की प्रेरणा से यहाँ विशाल आराधना भवन, यांत्रिक भवन, भोजन शाला, ज्ञान भंडार, पेढ़ी, नेमिनाथ नगर, विशाल द्वार, भावी चौबीसी के गोखले, जीवदया मंडप, समोहशरण, उपाश्रय का नव निर्माण कराया, लेकिन विधाता को यह स्वीकार नहीं था कि जिस महाप्रासाद का निर्माण करा रहे हैं वहाँ उनके चरण पड़ सकें और प्रतिष्ठा करा सकें।
इसके पूर्व ही वे दिव्य लोक में विहार कर गये लेकिन उनकी दिव्य कृपा आज भी बरस रही है, जिनके घट-घट में श्रीनेमिनाथ प्रभु बसे थे उनके अस्वस्थ होने से उनका भार इस तीर्थोध्दारक श्री हर्षतिलक विजय जी पर आया। जिन्होने कर्मठ परिश्रम, अद्वितीय साहस, योग्यता, प्रभु निष्ठा, प्रेरक प्रवचन और मधुरवाणी का परिचय देते हुए अनेक संकटों, समस्याओं बाधाओं का जिंदादिली से सामना करते हुए आज इसे भारत प्रसिध्द बनाने में सफल हुए समाज सदा ऋणी रहेगा।
उन्ही की कृपा से यह विशाल जिनालय प्रतिष्ठा की प्रतीक्षा में हिमालय की तरह शान से आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। इसकी मनमोहनी चित्ताकर्षक नक्काशी की जितनी प्रशंसा की जाये कम है। पत्थरों को जिस तरह तराशा गया है वह शायद आबू देलवाड़ा के मंदिरों से कम नहीं है। मालवा के गिरनार के रुप में यह सम्पूर्ण भारत में प्रसिध्द हो चुका है। विदेशों में भी इसकी गूंज सुनाई दे रही है।
अपने अमृत वचनों से लाभान्वित करने वाले प्रशांतमना प.पू.आचार्य भगवंत श्री अजित सेन सू.म.सा. तथा मुम्बई से उग्र विहार करके आष्टा पधारकर अपनी चरण रज से इस भूमि को पावन करने वाले आचार्य भगवंत श्री नयवर्धन सू.म.सा. तथा पन्यास प्रवर श्री हर्ष तिलक विजयजी म.सा. आदि साधु-साध्वी भगवंतों की शुभ निश्रा में 2 से 11 मार्च 2008 तक भव्य अंजन शलाका एवं प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न होगा। जिस ऐतिहासिक घड़ी का बेसब्री से इंतजार थ वह अब आ चुकी है। वे सब भाई बहन भाग्यशाली हैं जो अपने जीवनकाल की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण प्रभु प्रतिष्ठा को देखकर लाभान्वित होंगे क्योंकि यह सौभाग्य इस प्रतिष्ठा के पश्चात इसी मंदिर की पुन: प्रतिष्ठा के रुप में शायद न जाने कितनी पीढ़ियों के बाद प्राप्त हो। सबको शुभकामनाएं एवं हार्दिक बधाई।