Saturday, January 12, 2008

वासनाओं की बयार में वैराग्य की चिंगारी काम नहीं करती-अवधेशानंद जी

आष्टा 10 जनवरी (फुरसत)। सूखी और घी मिश्रित लकड़ियों की तुलना में गीली लकड़ियों पर चिंगारी का असर उसी तरह नहीं होता जिस तरीके से विषयों में भीगा मन, वासनाओं की बयार पर वैराग्य और आध्यात्म की चिंगारी काम नहीं करती। मन पर अगर वैराग्य का असर देखना है तो उसे वासना और भोग विलास से मुक्त करना होगा क्योंकि मनुष्य तब ही सुन्दर दिखने लगता है जब उसमें त्याग की भावना जन्म लेती है।
उक्त प्रखर और सारगर्भित विचार श्रीमद भागवत कथा के चौथे दिन पूय प्रवर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज भगवान विष्णु के वामन अवतार, राजा, बलि के दान की महिमा, नवम स्कंध में रामचरित्र की महिमा, यज्ञ की विशेषता और नटखट कृष्ण जन्म प्रसंगों की व्याख्या करते हुए व्यक्त किये। स्वामी जी ने यज्ञ कार्यों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारी संस्कृति सत्य कर्म का घनीभूत पुंज है जहाँ पर अतिथि देवो भव, तीर्थ संत माता-पिता के प्रकृति में भिन्न-भिन्न रु प संभव है। इसलिये हम अगि्, चन्द्रमा, वायु को देवता के रुप में अनुसरण करते हैं। यह संस्कृति और विधा ही नारायण का साकार रुप प्रदान करती है क्योंकि हमारा स्थूल शरीर हैद्व जबकि देवताओं का सूक्ष्म। देवताओं को साक्षात करने के लिये यज्ञ विधा से साकार किया जा सकता है। यज्ञ में मृत्यु और भावना का बड़ा महत्व है, अगर इसमें यह दोनो बातें शामिल नहीं है तो यह केवल स्वाहा करना मात्र है। अगर यज्ञ का विधान सही है पूजा विधि ठीक है, ध्यान विधि ठीक है, गंध, पुष्प, अक्षत, दीप, दक्षिणा, प्रदक्षिणा विधि सम्मत है तब इसका लाभ जरुर मिलता है। स्वामी जी ने राजा बलि के दान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि जब बलि के हाथ से अमृत कलश छूट गया, तब ऋषि शुक्राचार्य ने यज्ञ के द्वारा दान करना सिखाया। स्वामी जी ने कहा कि माता, पिता गुरु और भगवान को दान नहीं दिया जाता, यह सभी दान की परिधि से पृथक हैं, दान उनको दिया जाता है जो कर्मकाण्ड करें, जो हमारी पीढ़ियों को तारें, देवगण और पितर का तर्पण करने वो साधु संत ही दान के अधिकारी हैं। दूसरों के हित पूर्ति का नाम ही दान है। माता-पिता और गुरु की सेवा की जाती है उनके आगे समर्पण किया जाता है यह सभी आत्म निवेदन की परिधि में आते हैं। इनसे ऋणमुक्त नहीं हुआ जा सकता। स्वामी जी ने यह भी सीख दी कि जब कोई आपको किसी मांगलिक कार्य के लिये चुने तब आपको अभिमान नहीं करना चाहिऐ क्योंकि आपके ऊपर बहुत से लोगों की जिम्मेदारी होती है आपके पास बहुत सारे लोगों के हिस्से हैं। बड़े लोगों को बड़ी-बड़ी चुनौतियाँ स्वीकार करना चाहिए। यज्ञ से भय, अवसाद और प्रमाद दूर होता है। यह उपचार की भी एक विधि है लेकिन इस विधि को व्यवसाय नहीं बनाना चाहिए। जब यज्ञ और कर्मकाण्ड में लाभ देखा जाने लगता है तब इसका महत्व खत्म हो जाता है। यज्ञ में मंत्रों की महत्ता बताते हुए स्वामी जी ने कहा कि मन स्पंदनों का जगत है, जब विधि विधान से मंत्रोच्चार किया जाता है तब परमात्मा भी आपके द्वार भिखारी बनकर आ जाते हैं। व्रत करने से संयम आता है, संकल्प पूर्ण होते हैं। स्वामी जी ने प्रसंग सुनाते हुए कहा कि इन्द्र की माँ अदिति ने बलि को स्वर्ग के सिंहासन पर बैठने से रोकने के लिये कड़ी तपस्या की थी, लेकिन अभिमान न आएं इसलिये उन्होने दूध को होठों पर लगाया था। जब भगवान विष्णु का बटुक वामन अवतार रुप में जन्म हुआ। तब अदिति ने उन्हे लंगोटी दी, अन्नपूर्णा ने भिक्षा, शिव ने रुद्राक्ष और अन्य देवताओं ने छत्र देकर उन्हे बलि का पुण्य छीनने के लिये भेजा। इस बीच स्वामी जी ने कवि प्रदीप की पंक्तियाँ तेरे द्वार खड़ा एक जोगी, भगवान भगत भर दे रे झोली.....सुमधुर गीत संगीत पर जैसे ही गुनगुनाई पूरा पांडाल गुंजायमान हो गया और जब भगवान वामन ने बलि से वह सबकुछ मांग लिया तब उन्होने बलि से वर मांगने क ो कहा कि धर्म, ज्ञान, वैराग्य, यश, ऐश्वर्य और मैं तुझको श्रीदान में देता हूँ। जब कभी भी इस पृथ्वी पर सत्कर्म होगा, मंगल कार्य होें और यज्ञ होंगे तब बलि तेरा नाम जरुर लिया जायेगा। दान में सबसे बड़ा दान बलिदान माना गया है। स्वामी जी ने बलि प्रसंग सुनाते हुए भक्तों से कहा कि सभी को अपना ज्ञान, समय, द्रव्य, अंश और प्राप्त हिससे में कुछ न कुछ अवश्य दान करना चाहिऐ।
स्वामी जी ने भागवत कथा के नवम स्क ंध का उल्लेख करते हुए श्रीराम चरित्र की सुन्दर महिमा का बखान किया और राम कथा बड़ी बलिहारी...भजन के द्वारा भक्त ों को रस विभोर कर दिया। स्वामी जी ने कहा कि राम की कथा संशय को नष्ट करती है क्योंकि राम भारत का चरित्र हैं। महावीर स्वामी इस राष्ट्र की एकता, बुध्द इस राष्ट्र का ध्यान और नानक इस राष्ट्र का ध्येय है।
स्वामी जी ने भागवत कथा के दशम स्कंध का उल्लेख करते हुए भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की विभिन्न लीलाओं का सारगर्भित वर्णन करते हुए कहा कि किस तरीके से भगवान ने देवकी के गर्भ में आने का निर्णय लिया आदि प्रसंगों का सहज वर्णन करते हुए आलकी की पालकी जय कन्हैया लाल की भजन के माध्यम से भक्ताें को झूमने के लिये मजबूर कर दिया। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तो वह समय कथा पाण्डाल में साकार होता नजर आया। गरबे की थाप पर छोटी-छोटी सजधजकर आईं बालिकाओं ने श्रीकृष्ण के जन्म का उद्धोष किया। बाबा नंद श्रीकृष्ण को कथा पांडाल मे ंलेकर आये, इसे बीच रंग-बिरंगी आतिशबाजियों ने श्रध्दालुओं का मन मोह लिया। आयो यशोदा का लल्ला, मोहल्ला में हल्ला सो मच गया....भजन पर पूरा पांडाल भक्तिमय रस में झूम उठा। हर्ष उल्लास के साथ प्रभु प्रेमियों ने भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव का साकार रुप होता देखा।