Saturday, January 12, 2008
जमीन के पुराने विवाद में परोलिया में हवाई फायर
जावर 10 जनवरी (फुरसत)। जावर थाना अन्तर्गत आने वाले ग्राम परोलिया चौहान में आज दोपहर के लगभग 3 बजे ग्राम के राजा उर्फ राजेन्द्र सिंह सेंधव दिलीप सिंह सेंधव के मकान के सामने पहुँचा तथा जिस वक्त पुरुष घर में कोई नहीं था। घर का मुखिया दिलीप सिंह जावर हाट करने आया हुआ था उसके पुत्र खेत पर गये हुए थे। तथा घर पर केवल एक महिला थी। उस वक्त राजा ने इन महिलाओं को भद्दी-भद्दी गालियाँ दी। घबराकर महिलाओं ने घर का फाटक लगा दिया। तब महिलाओं का ऐसा कहना है कि राजा ने हवाई फायर किया बाद में दिलीप सिंह जब हाठ करके घर पहुँचा तो महिलाओं ने आज दोपहर में घटी उक्त घटना पूरी उन्हे बताई। तब दिलीप सिंह ने उक्त घटना की जावर पुलिस को जावर पहुँचकर सूचना दी। आज शाम को सूचना के बाद एसडीओपी मनु व्यास जावर थाना प्रभारी मोहन जाट परोलिया चौहान पहुँचे तथा घटना की विस्तृत जानकारी ली। एसडीओपी मनु व्यास ने बताया कि इनके बीच दो-तीन साल पुराना विवाद है तथा महिलाओं ने चर्चा में बताया कि उन्हे गोली चलने की भी आवाज सुनाई दी। कार्यवाही की जायेगी।
मकर सक्रांति पर आयोजित होगी बैलगाड़ी दौड़ प्रति.
सीहोर 10 जनवरी (फुरसत)। शहर में कई वर्षो बाद एक बार फिर नगर में बैलगाड़ी दौड प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है । यह प्रतियोगिता करोरी वाली माता मंदिर मैदान गंज पर 15 जनवरी को प्रात: 11 बजे से प्रारंभ होगी इस प्रतियोगिता के लिए आयोजन समिति का गठन भी किया गया है ।
मकर सक्रांति पर बैलगाड़ी दौड की परम्परा वर्षो सें है यह परम्परा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। आयोजन समिति ने यह परम्परा एक बार फिर इसके पुन: उद्धार के लिए प्रयास शुरू किया है। आयोजन समिति कि एक बैठक आयोजित कि गई जिसमें सर्व सम्मति से अध्यक्ष शंक र लाल पहलवान को चुना गया है । उपाध्यक्ष भूर लाल यादव, कोषाध्यक्ष पुरूषोत्तम यादव, महासचिव दशरथ यादव, को चुना गया है।
आयोजन समिति के अध्यक्ष शंकर लाल यादव व पुरूषोत्तम यादव ने बताया कि 15 जनवरी मकर सकं्राति पर प्रात: 11 बजे शुरू होने जा रही इस प्रतियोगिता में प्रथम पुरूस्कार 501 रूपये व शील्ड रखी गई है। जबकि द्वितीय पुरस्कार 301 रू. व शील्ड, तृतीय पुरस्कार 301 रू. व शील्ड रखी गई है।
मकर सक्रांति पर बैलगाड़ी दौड की परम्परा वर्षो सें है यह परम्परा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। आयोजन समिति ने यह परम्परा एक बार फिर इसके पुन: उद्धार के लिए प्रयास शुरू किया है। आयोजन समिति कि एक बैठक आयोजित कि गई जिसमें सर्व सम्मति से अध्यक्ष शंक र लाल पहलवान को चुना गया है । उपाध्यक्ष भूर लाल यादव, कोषाध्यक्ष पुरूषोत्तम यादव, महासचिव दशरथ यादव, को चुना गया है।
आयोजन समिति के अध्यक्ष शंकर लाल यादव व पुरूषोत्तम यादव ने बताया कि 15 जनवरी मकर सकं्राति पर प्रात: 11 बजे शुरू होने जा रही इस प्रतियोगिता में प्रथम पुरूस्कार 501 रूपये व शील्ड रखी गई है। जबकि द्वितीय पुरस्कार 301 रू. व शील्ड, तृतीय पुरस्कार 301 रू. व शील्ड रखी गई है।
मोहर्रम का चौकी धुलने का जुलूस उत्साह के साथ निकला
सीहोर 10 जनवरी (फुरसत)। नगर में आज तीन स्थानों से मोहर्रम के जुलूस उठे जिसमें बहुत बड़ी संख्या में मुस्लिम समाज के लोग उपस्थित थे। इस वर्ष मोहर्रम का चौकी धुलने का जुलूस पूरे दुगने उत्साह के साथ देर रात निकला। जिसमें मुँह से आग निकालते युवकों का कमाल देखते ही बन रहा था। जुलूस में बहुत बड़ी संख्या में नवयुवक सम्मिलित थे। विभिन्न स्थानों से निकले जुलूस में पुलिस ले-देकर दिख ही नहीं रही थी। ढूंढने पर जब पुलिस नहीं मिली तो पता करने पर जानकारी मिल सकी की पुलिस के 4-5 सिपाही जुलूस में लगाये गये हैं। इस धार्मिक जुलूस में सभी युवा हाथों में अनेक प्रकार शस्त्र-अस्त्र लेकर या हुसैन-या हुसैन या हुसैन कहते हुए आपस में मातम मना रहे थे।
आजाद अखाड़ा गंज, मासूम अखाड़ा मछली बाजार तथा मोहम्मदी अखाड़ा चकला चौराहा से आज मोहर्रम का प्रभावी जुलूस निकला। मोहम्मदी अखाड़े के नेतृत्व में तीनों जुलूस नमक चौराहा होते हुए सीवन नदी घांट पहुँचे जहाँ उन्होने चौकियाँ धोई तथा वहाँ से वापस नमक चौराहा होते हुए अपने-अपने स्थान पर पहुँचे। आज कस्बा क्षेत्र में भी चौकी धुलने का क्रम रहा जहाँ बकायदा एक जुलूस निकला। आज मुस्लिम त्यौहार कमेटी के अध्यक्ष रिजवान पठान, उपाध्यक्ष मोहम्मद इरशाद, अजीज चाचा, हाजी अतिकुर्रहमान, शहादत सगीर पहलवान, अन्नु कुरैशी, अब्दुल हमीद चौधरी मुस्लिम कौंसिल सदर, मोहम्मद उस्ताद आदि प्रमुख रुप से सम्मिलित थे।
अब आगामी मोहर्रम की 5 तारीख को भी मातम का एक जुलूस मछली बाजार से निकलेगा। आश्चर्य है कि पुलिस इतनी अधिक सुप्त क्या किसी के इशारे पर है। जिलाधीश को सीहोर नगर की वर्तमान परिस्थितियों, लगातार घट रहे घटनाक्रमों को मद्देनजर रखते हुए पुलिस विभाग की सक्रियता पर ध्यान देने की आवश्यकता सभी को प्रतीत हो रही थी।
आजाद अखाड़ा गंज, मासूम अखाड़ा मछली बाजार तथा मोहम्मदी अखाड़ा चकला चौराहा से आज मोहर्रम का प्रभावी जुलूस निकला। मोहम्मदी अखाड़े के नेतृत्व में तीनों जुलूस नमक चौराहा होते हुए सीवन नदी घांट पहुँचे जहाँ उन्होने चौकियाँ धोई तथा वहाँ से वापस नमक चौराहा होते हुए अपने-अपने स्थान पर पहुँचे। आज कस्बा क्षेत्र में भी चौकी धुलने का क्रम रहा जहाँ बकायदा एक जुलूस निकला। आज मुस्लिम त्यौहार कमेटी के अध्यक्ष रिजवान पठान, उपाध्यक्ष मोहम्मद इरशाद, अजीज चाचा, हाजी अतिकुर्रहमान, शहादत सगीर पहलवान, अन्नु कुरैशी, अब्दुल हमीद चौधरी मुस्लिम कौंसिल सदर, मोहम्मद उस्ताद आदि प्रमुख रुप से सम्मिलित थे।
अब आगामी मोहर्रम की 5 तारीख को भी मातम का एक जुलूस मछली बाजार से निकलेगा। आश्चर्य है कि पुलिस इतनी अधिक सुप्त क्या किसी के इशारे पर है। जिलाधीश को सीहोर नगर की वर्तमान परिस्थितियों, लगातार घट रहे घटनाक्रमों को मद्देनजर रखते हुए पुलिस विभाग की सक्रियता पर ध्यान देने की आवश्यकता सभी को प्रतीत हो रही थी।
वासनाओं की बयार में वैराग्य की चिंगारी काम नहीं करती-अवधेशानंद जी
आष्टा 10 जनवरी (फुरसत)। सूखी और घी मिश्रित लकड़ियों की तुलना में गीली लकड़ियों पर चिंगारी का असर उसी तरह नहीं होता जिस तरीके से विषयों में भीगा मन, वासनाओं की बयार पर वैराग्य और आध्यात्म की चिंगारी काम नहीं करती। मन पर अगर वैराग्य का असर देखना है तो उसे वासना और भोग विलास से मुक्त करना होगा क्योंकि मनुष्य तब ही सुन्दर दिखने लगता है जब उसमें त्याग की भावना जन्म लेती है।
उक्त प्रखर और सारगर्भित विचार श्रीमद भागवत कथा के चौथे दिन पूय प्रवर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज भगवान विष्णु के वामन अवतार, राजा, बलि के दान की महिमा, नवम स्कंध में रामचरित्र की महिमा, यज्ञ की विशेषता और नटखट कृष्ण जन्म प्रसंगों की व्याख्या करते हुए व्यक्त किये। स्वामी जी ने यज्ञ कार्यों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारी संस्कृति सत्य कर्म का घनीभूत पुंज है जहाँ पर अतिथि देवो भव, तीर्थ संत माता-पिता के प्रकृति में भिन्न-भिन्न रु प संभव है। इसलिये हम अगि्, चन्द्रमा, वायु को देवता के रुप में अनुसरण करते हैं। यह संस्कृति और विधा ही नारायण का साकार रुप प्रदान करती है क्योंकि हमारा स्थूल शरीर हैद्व जबकि देवताओं का सूक्ष्म। देवताओं को साक्षात करने के लिये यज्ञ विधा से साकार किया जा सकता है। यज्ञ में मृत्यु और भावना का बड़ा महत्व है, अगर इसमें यह दोनो बातें शामिल नहीं है तो यह केवल स्वाहा करना मात्र है। अगर यज्ञ का विधान सही है पूजा विधि ठीक है, ध्यान विधि ठीक है, गंध, पुष्प, अक्षत, दीप, दक्षिणा, प्रदक्षिणा विधि सम्मत है तब इसका लाभ जरुर मिलता है। स्वामी जी ने राजा बलि के दान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि जब बलि के हाथ से अमृत कलश छूट गया, तब ऋषि शुक्राचार्य ने यज्ञ के द्वारा दान करना सिखाया। स्वामी जी ने कहा कि माता, पिता गुरु और भगवान को दान नहीं दिया जाता, यह सभी दान की परिधि से पृथक हैं, दान उनको दिया जाता है जो कर्मकाण्ड करें, जो हमारी पीढ़ियों को तारें, देवगण और पितर का तर्पण करने वो साधु संत ही दान के अधिकारी हैं। दूसरों के हित पूर्ति का नाम ही दान है। माता-पिता और गुरु की सेवा की जाती है उनके आगे समर्पण किया जाता है यह सभी आत्म निवेदन की परिधि में आते हैं। इनसे ऋणमुक्त नहीं हुआ जा सकता। स्वामी जी ने यह भी सीख दी कि जब कोई आपको किसी मांगलिक कार्य के लिये चुने तब आपको अभिमान नहीं करना चाहिऐ क्योंकि आपके ऊपर बहुत से लोगों की जिम्मेदारी होती है आपके पास बहुत सारे लोगों के हिस्से हैं। बड़े लोगों को बड़ी-बड़ी चुनौतियाँ स्वीकार करना चाहिए। यज्ञ से भय, अवसाद और प्रमाद दूर होता है। यह उपचार की भी एक विधि है लेकिन इस विधि को व्यवसाय नहीं बनाना चाहिए। जब यज्ञ और कर्मकाण्ड में लाभ देखा जाने लगता है तब इसका महत्व खत्म हो जाता है। यज्ञ में मंत्रों की महत्ता बताते हुए स्वामी जी ने कहा कि मन स्पंदनों का जगत है, जब विधि विधान से मंत्रोच्चार किया जाता है तब परमात्मा भी आपके द्वार भिखारी बनकर आ जाते हैं। व्रत करने से संयम आता है, संकल्प पूर्ण होते हैं। स्वामी जी ने प्रसंग सुनाते हुए कहा कि इन्द्र की माँ अदिति ने बलि को स्वर्ग के सिंहासन पर बैठने से रोकने के लिये कड़ी तपस्या की थी, लेकिन अभिमान न आएं इसलिये उन्होने दूध को होठों पर लगाया था। जब भगवान विष्णु का बटुक वामन अवतार रुप में जन्म हुआ। तब अदिति ने उन्हे लंगोटी दी, अन्नपूर्णा ने भिक्षा, शिव ने रुद्राक्ष और अन्य देवताओं ने छत्र देकर उन्हे बलि का पुण्य छीनने के लिये भेजा। इस बीच स्वामी जी ने कवि प्रदीप की पंक्तियाँ तेरे द्वार खड़ा एक जोगी, भगवान भगत भर दे रे झोली.....सुमधुर गीत संगीत पर जैसे ही गुनगुनाई पूरा पांडाल गुंजायमान हो गया और जब भगवान वामन ने बलि से वह सबकुछ मांग लिया तब उन्होने बलि से वर मांगने क ो कहा कि धर्म, ज्ञान, वैराग्य, यश, ऐश्वर्य और मैं तुझको श्रीदान में देता हूँ। जब कभी भी इस पृथ्वी पर सत्कर्म होगा, मंगल कार्य होें और यज्ञ होंगे तब बलि तेरा नाम जरुर लिया जायेगा। दान में सबसे बड़ा दान बलिदान माना गया है। स्वामी जी ने बलि प्रसंग सुनाते हुए भक्तों से कहा कि सभी को अपना ज्ञान, समय, द्रव्य, अंश और प्राप्त हिससे में कुछ न कुछ अवश्य दान करना चाहिऐ।
स्वामी जी ने भागवत कथा के नवम स्क ंध का उल्लेख करते हुए श्रीराम चरित्र की सुन्दर महिमा का बखान किया और राम कथा बड़ी बलिहारी...भजन के द्वारा भक्त ों को रस विभोर कर दिया। स्वामी जी ने कहा कि राम की कथा संशय को नष्ट करती है क्योंकि राम भारत का चरित्र हैं। महावीर स्वामी इस राष्ट्र की एकता, बुध्द इस राष्ट्र का ध्यान और नानक इस राष्ट्र का ध्येय है।
स्वामी जी ने भागवत कथा के दशम स्कंध का उल्लेख करते हुए भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की विभिन्न लीलाओं का सारगर्भित वर्णन करते हुए कहा कि किस तरीके से भगवान ने देवकी के गर्भ में आने का निर्णय लिया आदि प्रसंगों का सहज वर्णन करते हुए आलकी की पालकी जय कन्हैया लाल की भजन के माध्यम से भक्ताें को झूमने के लिये मजबूर कर दिया। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तो वह समय कथा पाण्डाल में साकार होता नजर आया। गरबे की थाप पर छोटी-छोटी सजधजकर आईं बालिकाओं ने श्रीकृष्ण के जन्म का उद्धोष किया। बाबा नंद श्रीकृष्ण को कथा पांडाल मे ंलेकर आये, इसे बीच रंग-बिरंगी आतिशबाजियों ने श्रध्दालुओं का मन मोह लिया। आयो यशोदा का लल्ला, मोहल्ला में हल्ला सो मच गया....भजन पर पूरा पांडाल भक्तिमय रस में झूम उठा। हर्ष उल्लास के साथ प्रभु प्रेमियों ने भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव का साकार रुप होता देखा।
उक्त प्रखर और सारगर्भित विचार श्रीमद भागवत कथा के चौथे दिन पूय प्रवर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज भगवान विष्णु के वामन अवतार, राजा, बलि के दान की महिमा, नवम स्कंध में रामचरित्र की महिमा, यज्ञ की विशेषता और नटखट कृष्ण जन्म प्रसंगों की व्याख्या करते हुए व्यक्त किये। स्वामी जी ने यज्ञ कार्यों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारी संस्कृति सत्य कर्म का घनीभूत पुंज है जहाँ पर अतिथि देवो भव, तीर्थ संत माता-पिता के प्रकृति में भिन्न-भिन्न रु प संभव है। इसलिये हम अगि्, चन्द्रमा, वायु को देवता के रुप में अनुसरण करते हैं। यह संस्कृति और विधा ही नारायण का साकार रुप प्रदान करती है क्योंकि हमारा स्थूल शरीर हैद्व जबकि देवताओं का सूक्ष्म। देवताओं को साक्षात करने के लिये यज्ञ विधा से साकार किया जा सकता है। यज्ञ में मृत्यु और भावना का बड़ा महत्व है, अगर इसमें यह दोनो बातें शामिल नहीं है तो यह केवल स्वाहा करना मात्र है। अगर यज्ञ का विधान सही है पूजा विधि ठीक है, ध्यान विधि ठीक है, गंध, पुष्प, अक्षत, दीप, दक्षिणा, प्रदक्षिणा विधि सम्मत है तब इसका लाभ जरुर मिलता है। स्वामी जी ने राजा बलि के दान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि जब बलि के हाथ से अमृत कलश छूट गया, तब ऋषि शुक्राचार्य ने यज्ञ के द्वारा दान करना सिखाया। स्वामी जी ने कहा कि माता, पिता गुरु और भगवान को दान नहीं दिया जाता, यह सभी दान की परिधि से पृथक हैं, दान उनको दिया जाता है जो कर्मकाण्ड करें, जो हमारी पीढ़ियों को तारें, देवगण और पितर का तर्पण करने वो साधु संत ही दान के अधिकारी हैं। दूसरों के हित पूर्ति का नाम ही दान है। माता-पिता और गुरु की सेवा की जाती है उनके आगे समर्पण किया जाता है यह सभी आत्म निवेदन की परिधि में आते हैं। इनसे ऋणमुक्त नहीं हुआ जा सकता। स्वामी जी ने यह भी सीख दी कि जब कोई आपको किसी मांगलिक कार्य के लिये चुने तब आपको अभिमान नहीं करना चाहिऐ क्योंकि आपके ऊपर बहुत से लोगों की जिम्मेदारी होती है आपके पास बहुत सारे लोगों के हिस्से हैं। बड़े लोगों को बड़ी-बड़ी चुनौतियाँ स्वीकार करना चाहिए। यज्ञ से भय, अवसाद और प्रमाद दूर होता है। यह उपचार की भी एक विधि है लेकिन इस विधि को व्यवसाय नहीं बनाना चाहिए। जब यज्ञ और कर्मकाण्ड में लाभ देखा जाने लगता है तब इसका महत्व खत्म हो जाता है। यज्ञ में मंत्रों की महत्ता बताते हुए स्वामी जी ने कहा कि मन स्पंदनों का जगत है, जब विधि विधान से मंत्रोच्चार किया जाता है तब परमात्मा भी आपके द्वार भिखारी बनकर आ जाते हैं। व्रत करने से संयम आता है, संकल्प पूर्ण होते हैं। स्वामी जी ने प्रसंग सुनाते हुए कहा कि इन्द्र की माँ अदिति ने बलि को स्वर्ग के सिंहासन पर बैठने से रोकने के लिये कड़ी तपस्या की थी, लेकिन अभिमान न आएं इसलिये उन्होने दूध को होठों पर लगाया था। जब भगवान विष्णु का बटुक वामन अवतार रुप में जन्म हुआ। तब अदिति ने उन्हे लंगोटी दी, अन्नपूर्णा ने भिक्षा, शिव ने रुद्राक्ष और अन्य देवताओं ने छत्र देकर उन्हे बलि का पुण्य छीनने के लिये भेजा। इस बीच स्वामी जी ने कवि प्रदीप की पंक्तियाँ तेरे द्वार खड़ा एक जोगी, भगवान भगत भर दे रे झोली.....सुमधुर गीत संगीत पर जैसे ही गुनगुनाई पूरा पांडाल गुंजायमान हो गया और जब भगवान वामन ने बलि से वह सबकुछ मांग लिया तब उन्होने बलि से वर मांगने क ो कहा कि धर्म, ज्ञान, वैराग्य, यश, ऐश्वर्य और मैं तुझको श्रीदान में देता हूँ। जब कभी भी इस पृथ्वी पर सत्कर्म होगा, मंगल कार्य होें और यज्ञ होंगे तब बलि तेरा नाम जरुर लिया जायेगा। दान में सबसे बड़ा दान बलिदान माना गया है। स्वामी जी ने बलि प्रसंग सुनाते हुए भक्तों से कहा कि सभी को अपना ज्ञान, समय, द्रव्य, अंश और प्राप्त हिससे में कुछ न कुछ अवश्य दान करना चाहिऐ।
स्वामी जी ने भागवत कथा के नवम स्क ंध का उल्लेख करते हुए श्रीराम चरित्र की सुन्दर महिमा का बखान किया और राम कथा बड़ी बलिहारी...भजन के द्वारा भक्त ों को रस विभोर कर दिया। स्वामी जी ने कहा कि राम की कथा संशय को नष्ट करती है क्योंकि राम भारत का चरित्र हैं। महावीर स्वामी इस राष्ट्र की एकता, बुध्द इस राष्ट्र का ध्यान और नानक इस राष्ट्र का ध्येय है।
स्वामी जी ने भागवत कथा के दशम स्कंध का उल्लेख करते हुए भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की विभिन्न लीलाओं का सारगर्भित वर्णन करते हुए कहा कि किस तरीके से भगवान ने देवकी के गर्भ में आने का निर्णय लिया आदि प्रसंगों का सहज वर्णन करते हुए आलकी की पालकी जय कन्हैया लाल की भजन के माध्यम से भक्ताें को झूमने के लिये मजबूर कर दिया। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तो वह समय कथा पाण्डाल में साकार होता नजर आया। गरबे की थाप पर छोटी-छोटी सजधजकर आईं बालिकाओं ने श्रीकृष्ण के जन्म का उद्धोष किया। बाबा नंद श्रीकृष्ण को कथा पांडाल मे ंलेकर आये, इसे बीच रंग-बिरंगी आतिशबाजियों ने श्रध्दालुओं का मन मोह लिया। आयो यशोदा का लल्ला, मोहल्ला में हल्ला सो मच गया....भजन पर पूरा पांडाल भक्तिमय रस में झूम उठा। हर्ष उल्लास के साथ प्रभु प्रेमियों ने भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव का साकार रुप होता देखा।
Friday, January 11, 2008
अर्पण तर्पण और समर्पण सिखाती है भारतीय संस्कृति – अवधेशानंद जी
आष्टा 9 जनवरी (फुरसत)। हमारी भारतीय संस्कृति का मूल रूप अर्पण, तर्पण और समर्पण रहा है। यह संस्कृति संग्रहण और संचय करना नहीं सिखाती। आपको यहॉ पर जो मिला है- ज्ञान, धन, सम्मान उसे अर्पण करना सीखो। अपने पूर्वजो का तर्पण करना, इसीलिए श्राध्द पक्ष आता है। और अंतिम संमर्पण करना। स्वयं को संत को, गुरू को सौंपना सीखो। मृत्यु आने से पूर्व अगर आपने अर्पण, तर्पण और समर्पण करना सीख लिया तो जीवन धन्य हो जायेगा। वर्तमान समय रूचि प्रधान बनता जा रहा है। पदार्थो, परिधानो और एश्वर्यगामी वस्तुओ के प्रति रूचि बढ़ती ही जा रही है। जब जीवन रूचि के अधीन हो जाता है तब नीति खो जाती है।
उक्त प्रखर विचार स्वामी अवधेशानंद गिरिजी महाराज ने कथा पॉडाल में भागवत् कथा में मंत्र की महिमा, ध्रुव की तपस्या और भगवान ऋषभ देव आख्यान एवं लोकहित के लिए दधिची के अर्पण प्रसंगो का सारगर्भित उल्लेख करते हुए व्यक्त किये। स्वामी जी ने कहा कि जल, अन्न और समय का बड़ा महत्व है। जल की एक-एक बूद और अन्न का प्रत्येक कण समय के हर क्षण अमूल्य है। इसको किसी भी कीमत पर बर्बाद नही करना चाहिए। एक अन्न का कण भी वेदो के अनुसार बड़ी लड़ाई का कारण बना था। दुर्योधन द्वारा दुर्वासा ऋषि और उनके 10 हजार शिष्यों की बड़ी आव भगत करने पर प्रसन्न दुर्वासा ऋषि ने दुर्योधन को वर मॉगने को कहा तब दुर्योधन ने यही कहा कि वह अपने षिष्यों के साथ दोपहर बाद पॉडवों के घर जाकर भोजन मॉगे। द्रोपदी के भोजन करने के पूर्व पात्र की यह विषेषता थी कि उससे जितना चाहे भोजन निकाला जा सकता था लेकिन द्रोपदी के भोजन करने के बाद नही और यहॉ पर भगवान कृष्ण ने द्रोपदी के पात्र से एक चावल को ग्रहण कर संपूर्ण संसार की भूख मिटा दी थी और दुर्वासा ऋषि शिष्यो के साथ भोजन करने नही पहुचें। यही है समपर्ण की षिक्षा की द्रोपदी भगवान कृष्ण से कहा कि इस एक चावल से खुद का भी पेट भरिये और हमारी भी लाज रखिए। उसी तरह जल की बुद और समय के क्षण महत्वपूर्ण है जिस तरह मरने वाले के लिए एक-एक सॉस। धुव, प्रहलाद नाम जपकर भवसागर पार उतर गये। भगवान के नाम की महिमा है। नाम, धाम, लीला और सहचर्य। नाम में ही भगवान, ईश्वर और गुरू छिपे है, इनके निरंतर ध्यान से इनकी प्राप्ती होती है। धुव अपनी सच्ची संकल्प शक्ति के बल पर ध्यान के लिए जंगल गया और नारद द्वारा दिये गये मंत्र ओम नमो: भगवते वासुदेव: का जाप करने लगा। जब धुव ने ऑखे मूदकर, सॉस थाम कर सच्चे मन से उपासना की तब षिव का डमरू अनायास ही बजने लगा, ब्रहमांड डगमगाने लगा। इन्द्र की सभा सुधरमा में नृत्य कर रही मेनका, उर्वषी की ताल और लय आड़ी-तेड़ी हो गई। भगवान विष्णु स्वयं धुव से मिलने चले आये। स्वामी जी ने कहा कि सच्चे संत, सच्चे फकीर बड़ी कठनाई से मिलते है। गीता में अर्जुन ने कृष्ण को बताया है कि सच्चे फकीर की प्राप्ती बड़ी दुर्लभ है। इसीलिए जब संत आपको ज्ञान करादें, प्रकाश का अनुभव करादें तब भी योग, पूजा, उपासना युक्ति नही छोड़ना। स्वामी जी ने भागवत के पंचम स्कंध का उल्लेख करते हुए राजा प्रियवृत से उत्पन्न संतान ऋषभ देव का संस्मरण सुनाया जिनके 100 पुत्र थे। किस तरह से उन्होने अंतिम पुत्र भरत को राज्य सौंपा, पहले पुत्र को अपने नैत्रो से षिक्षा दी, नौ पुत्रो को कर्म-काण्ड सिखाया, 36 पुत्रो को संकल्प शक्ति दिलवायी और किस तरीके से वानप्रस्थ का उन्होने अनुसरण किया। स्वामी जी ने कहा कि प्रभू को पाने के तीन उपाय है भक्ति, ज्ञान और कर्म। भक्ति उस बिल्ली की तरह होना चाहिए जिस तरह से वह बच्चो को जन्म देने के बाद अपनी मुह मे दबाकर सात घर बदलती है ठीक उसी तरह से आप स्वयं को गुरू को समर्पित करोगे तभी जीवन सफल होगा।
स्वामी जी ने सीख दी कि उच्च व्यक्तियो , शीर्ष व्यक्तियों को और बड़े व्यक्तियों को अपने से छोटे , दीन-हीन और दरिद्र लोगो के साथ अपने की भूमिका निभाना चाहिए, अपने साथ लेकर चलना चाहिए। वनस्पतियों के साथ भी हमे अनुशासित और प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। सूखी लकड़ियो को बिना अनुमति के उपयोग में लाया जा सकता है लेकिन वृक्षों की डालियों, पत्तों आदि को बिना प्रणाम किये नही तोड़ना चाहिए।
इसके पूर्व स्वामी जी ने आष्टा नगरी की भूरी-भूरी प्रंषसा करते हुए कहा कि जब धरती के नवद्रव्य, जल की आद्रता, आकाष की क्षितिजता और अग्नि की पावनता, आनंद विभोर वातावरण का निर्माण कर रही हो। तब आध्यात्मिक माहौल बन ही जाता है। आध्यात्मिक वातावरण में समुची धरती, प्रकृति शांत, संयत और हर्षित दिखती है।
इसके पूर्व दीप प्रज्जवलन अंतराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी मीर रंजन नैगी , भोपाल के डॉ. गोयनका, ललित अग्रवाल, अजीत जैन, दिलीप सुराणा, ने किया। स्वामी जी के चरणो में पुष्प गुच्छ भेंट करने वालो में रामेश्वर खंडेलवाल, मांगीलाल साहू, विजय देशलहरा, सुरेष पालीवाल, सुधीर पाठक, मांगीलाल पटेल भॅवरा ,प्रेमबंधू शर्मा सीहोर जबकि आरती में एस.डी.ओ (पुलिस)मनु व्यास, कैलाश सोनी अंलकार, दिगम्बर जैन महिला मंडल, मु.न.पा. अधिकारी दीपक राय, रामेष्वर खंडेलवाल, श्रीमति पार्वती सोनी, विनित सिंगी, राजाराम कसौटिया, सी.बी.परमार आदि शामिल थे।
मुख्य बातें
- गंगा का स्नान, यमुना का पान और नर्मदा के दर्शन बराबर पुण्य लाभ देते है।
- तंत्र 6 प्रकार के होते है मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तंभन और विद्वेषण
- जल की एक-एक बूद, अन्न का प्रत्येक कण और समय का हर क्षण मूल्यवान है।
- ईश्वर की उपासना के लिए किसी विधान या सुझाव की जरूरत नही होती।
- प्रभू प्राप्ती के तीन उपाय है, भक्ति, ज्ञान, और कर्म ।
उक्त प्रखर विचार स्वामी अवधेशानंद गिरिजी महाराज ने कथा पॉडाल में भागवत् कथा में मंत्र की महिमा, ध्रुव की तपस्या और भगवान ऋषभ देव आख्यान एवं लोकहित के लिए दधिची के अर्पण प्रसंगो का सारगर्भित उल्लेख करते हुए व्यक्त किये। स्वामी जी ने कहा कि जल, अन्न और समय का बड़ा महत्व है। जल की एक-एक बूद और अन्न का प्रत्येक कण समय के हर क्षण अमूल्य है। इसको किसी भी कीमत पर बर्बाद नही करना चाहिए। एक अन्न का कण भी वेदो के अनुसार बड़ी लड़ाई का कारण बना था। दुर्योधन द्वारा दुर्वासा ऋषि और उनके 10 हजार शिष्यों की बड़ी आव भगत करने पर प्रसन्न दुर्वासा ऋषि ने दुर्योधन को वर मॉगने को कहा तब दुर्योधन ने यही कहा कि वह अपने षिष्यों के साथ दोपहर बाद पॉडवों के घर जाकर भोजन मॉगे। द्रोपदी के भोजन करने के पूर्व पात्र की यह विषेषता थी कि उससे जितना चाहे भोजन निकाला जा सकता था लेकिन द्रोपदी के भोजन करने के बाद नही और यहॉ पर भगवान कृष्ण ने द्रोपदी के पात्र से एक चावल को ग्रहण कर संपूर्ण संसार की भूख मिटा दी थी और दुर्वासा ऋषि शिष्यो के साथ भोजन करने नही पहुचें। यही है समपर्ण की षिक्षा की द्रोपदी भगवान कृष्ण से कहा कि इस एक चावल से खुद का भी पेट भरिये और हमारी भी लाज रखिए। उसी तरह जल की बुद और समय के क्षण महत्वपूर्ण है जिस तरह मरने वाले के लिए एक-एक सॉस। धुव, प्रहलाद नाम जपकर भवसागर पार उतर गये। भगवान के नाम की महिमा है। नाम, धाम, लीला और सहचर्य। नाम में ही भगवान, ईश्वर और गुरू छिपे है, इनके निरंतर ध्यान से इनकी प्राप्ती होती है। धुव अपनी सच्ची संकल्प शक्ति के बल पर ध्यान के लिए जंगल गया और नारद द्वारा दिये गये मंत्र ओम नमो: भगवते वासुदेव: का जाप करने लगा। जब धुव ने ऑखे मूदकर, सॉस थाम कर सच्चे मन से उपासना की तब षिव का डमरू अनायास ही बजने लगा, ब्रहमांड डगमगाने लगा। इन्द्र की सभा सुधरमा में नृत्य कर रही मेनका, उर्वषी की ताल और लय आड़ी-तेड़ी हो गई। भगवान विष्णु स्वयं धुव से मिलने चले आये। स्वामी जी ने कहा कि सच्चे संत, सच्चे फकीर बड़ी कठनाई से मिलते है। गीता में अर्जुन ने कृष्ण को बताया है कि सच्चे फकीर की प्राप्ती बड़ी दुर्लभ है। इसीलिए जब संत आपको ज्ञान करादें, प्रकाश का अनुभव करादें तब भी योग, पूजा, उपासना युक्ति नही छोड़ना। स्वामी जी ने भागवत के पंचम स्कंध का उल्लेख करते हुए राजा प्रियवृत से उत्पन्न संतान ऋषभ देव का संस्मरण सुनाया जिनके 100 पुत्र थे। किस तरह से उन्होने अंतिम पुत्र भरत को राज्य सौंपा, पहले पुत्र को अपने नैत्रो से षिक्षा दी, नौ पुत्रो को कर्म-काण्ड सिखाया, 36 पुत्रो को संकल्प शक्ति दिलवायी और किस तरीके से वानप्रस्थ का उन्होने अनुसरण किया। स्वामी जी ने कहा कि प्रभू को पाने के तीन उपाय है भक्ति, ज्ञान और कर्म। भक्ति उस बिल्ली की तरह होना चाहिए जिस तरह से वह बच्चो को जन्म देने के बाद अपनी मुह मे दबाकर सात घर बदलती है ठीक उसी तरह से आप स्वयं को गुरू को समर्पित करोगे तभी जीवन सफल होगा।
स्वामी जी ने सीख दी कि उच्च व्यक्तियो , शीर्ष व्यक्तियों को और बड़े व्यक्तियों को अपने से छोटे , दीन-हीन और दरिद्र लोगो के साथ अपने की भूमिका निभाना चाहिए, अपने साथ लेकर चलना चाहिए। वनस्पतियों के साथ भी हमे अनुशासित और प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। सूखी लकड़ियो को बिना अनुमति के उपयोग में लाया जा सकता है लेकिन वृक्षों की डालियों, पत्तों आदि को बिना प्रणाम किये नही तोड़ना चाहिए।
इसके पूर्व स्वामी जी ने आष्टा नगरी की भूरी-भूरी प्रंषसा करते हुए कहा कि जब धरती के नवद्रव्य, जल की आद्रता, आकाष की क्षितिजता और अग्नि की पावनता, आनंद विभोर वातावरण का निर्माण कर रही हो। तब आध्यात्मिक माहौल बन ही जाता है। आध्यात्मिक वातावरण में समुची धरती, प्रकृति शांत, संयत और हर्षित दिखती है।
इसके पूर्व दीप प्रज्जवलन अंतराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी मीर रंजन नैगी , भोपाल के डॉ. गोयनका, ललित अग्रवाल, अजीत जैन, दिलीप सुराणा, ने किया। स्वामी जी के चरणो में पुष्प गुच्छ भेंट करने वालो में रामेश्वर खंडेलवाल, मांगीलाल साहू, विजय देशलहरा, सुरेष पालीवाल, सुधीर पाठक, मांगीलाल पटेल भॅवरा ,प्रेमबंधू शर्मा सीहोर जबकि आरती में एस.डी.ओ (पुलिस)मनु व्यास, कैलाश सोनी अंलकार, दिगम्बर जैन महिला मंडल, मु.न.पा. अधिकारी दीपक राय, रामेष्वर खंडेलवाल, श्रीमति पार्वती सोनी, विनित सिंगी, राजाराम कसौटिया, सी.बी.परमार आदि शामिल थे।
मुख्य बातें
- गंगा का स्नान, यमुना का पान और नर्मदा के दर्शन बराबर पुण्य लाभ देते है।
- तंत्र 6 प्रकार के होते है मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तंभन और विद्वेषण
- जल की एक-एक बूद, अन्न का प्रत्येक कण और समय का हर क्षण मूल्यवान है।
- ईश्वर की उपासना के लिए किसी विधान या सुझाव की जरूरत नही होती।
- प्रभू प्राप्ती के तीन उपाय है, भक्ति, ज्ञान, और कर्म ।
356 शहीद क्रांतिकारियों की जीर्ण-शीर्ण समाधियों की तरफ शासन का ध्यान नहीं
हम कैसे भूल जायें उन शहीदों को...
सीहोर 9 जनवरी । स्वतंत्रता संग्राम के गौरवमयी इतिहास में पूरे मध्य भारत का सबसे समृध्द इतिहास यदि किसी क्षेत्र का है तो वह सीहोर है। यहाँ अंग्रेज सैनिकों की छावनी थी। सन् 1857 के इतिहास के पन्नों में सीहोर में हुई सैनिक क्रांति दर्ज तो है लेकिन आज तक इसे स्थानीय स्तर पर ही शासन द्वारा महत्व नहीं मिल सका। अनेक ऐतिहासिक पुस्तकों में सीहोर के इतिहास की दास्तां लिखी है। सिपाही बहादुर सरकार के गठन से लेकर उसकेजाबांज 356 सैनिकों के जनरल ह्यूरोज द्वारा कराये गये सामुहिक हत्याकाण्ड तक का घटनाक्रम हम कैसे भूल जायें.....अपने इतिहास से सीहोर अनजान रह गया। इन शहीदों की समाधियाँ जीर्ण-शीर्ण शेष रह गई हैं जिसके आसपास जमीन पर कब्जा कर लोग अपनी खेती बाड़ी कर रहे हैं। लेकिन इनकी तरफ मध्य प्रदेश शासन और स्थानीय जिला प्रशासन व पुरातत्व विभाग का कोई ध्यान नहीं है।
देश की स्वतंत्रता के 60 साल बीत जाने के बाद भी सीहोर का गौरवमयी स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास धूल की पर्तो में दबा हुआ है। हम कैसे भूल जायें कि सीहोर की वीर धरती पर भारत का पहला स्वतंत्रता आंदोलन सबसे दमदारी के साथ लड़ा गया था। हम कैसे भुला दें कि 6 अगस्त 1857 से लेकर 14 जनवरी 1858 तक पूरे 6 माह हम पूरे सीहोरवासी देश में एकमात्र स्वतंत्र थे इस गौरव को हम कैसे भूल सकते हैं....? हम कैसे भूल जायें कि यहाँ अंग्रेजों की छावनी में ही भारतीयों ने सारे अंग्रेजों को खदेड़कर भगा दिया था और सीहोर आजाद करा लिया था....? हम कैसे भूल जायें कि महावीर कोठ नामक क्रांतिकारी के नाम पर सीहोर में छ: माह तक महावीर कौंसिल के नाम से शासन हुआ और अंग्रेजों के झण्डे को उतारकर निशाने मोहम्मदी व निशाने महावीरी नामक दो झण्डे पूरे 6 माह तक हर दिन स्वतंत्रता की गौरवगाथा गाते हुए लहराते रहे....।
हम कैसे भूल जायें कि सीहोर में सिपाही बहादुर सरकार महावीर कौंसिल के संस्थापकों ने अंग्रेजों को मार-मारकर खदेड दिया था, मुगल सल्तनत व अंग्रेजों के झण्डे उखाड़ दिये थे...उन वीरों का स्मरण करना क्या आज भारतीयों का, हमारा कर्तव्य नहीं है।
14 जनवरी 1858 के कुछ दिनों पूर्व जनरल ह्यूरोज (जिसने झांसी की रानी लक्ष्मी से युध्द किया था) ने सीहोर आकर यहाँ की सिपाही बहादुर सरकार के वीर सिपाहियों को चारों तरफ घेर लिया था। उन्हे भोपाल की सिकन्दर जहाँ बेगम (खूनी बेगम)की सहायता से बंदी बना लिया गया और अंतत: उन्हे कैद में डाल दिया गया। फिर मांफी मांगने को कहा गया....।
लेकिन किसी भी वीर क्रांतिकारी ने अंग्रेजो से माफी नहीं मांगी। यह क्रांतिकारी कोई 3-4 या 10-12 नहीं थे वरन पूरे 356 से अधिक थे जिन्होने एक साथ कह दिया कि चाहे इस भारत माँ की गोद में सो जायेंगे लेकिन माफी नहीं मागेंगे....अपने धर्म से विमुख नहीं होंगे....(मांस लगे कारतूसों के खिलाफ) और क्रांतिकारियों ने सामुहिक रुप से माफी लिखकर नहीं मांगी अंतत: मजबूर होकर ह्यूरोज ने इतने अधिक लोगों को एक साथ मारने का फैसला करते हुए 14 जनवरी 1858 को 356 क्रांतिकारियों को गोलियों से भुनवा दिया.....। पूरे भारत में इससे बड़ा हत्याकाण्ड कभी नहीं घटा था।
कहा जाता है कि कुछ लोगों को सामुहिक रुप से फांसी भी दी गई क्योंकि ह्यूरोज को फांसी पर लटके क्रांतिकारियों के शव देखने में मजा आता था। एक साथ 356 सैनिकों के शवों का अंतिम संस्कार सीहोर की जनता ने फिर यहीं सीवन नदी के किनारे अलग-अलग स्थान पर करते हुए उनकी समाधियाँ बना दी। यही समाधियाँ आज भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में स्थित हैं।
उन वीर सपूतों की शहादत को भूल गया है सीहोर। आजादी के बाद आये शासन ने स्वतंत्रता संग्राम के इन वीरों को सम्मान देने, उनका स्मरण करने की जहमत नहीं उठाई। हालांकि मध्य प्रदेश शासन संस्कृति विभाग, स्वराज संस्थान संचालनालय द्वारा सिपाही बहादुर के नाम से सीहोर की आजादी का स्वर्णिम इतिहास प्रकाशित कराया गया है लेकिन इसके बावजूद शासन ने इस तरफ गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। जिला प्रशासन सीहोर की पुरातत्व शाखा ने भी इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। जबकि पुरातत्व का एक संग्रहालय यहाँ बना हुआ है। विभाग बकायदा इसकी देखभाल करता है लेकिन इन जीर्ण-शीर्ण समाधियों की तरफ इसका ध्यान नहीं है। यहाँ शासन स्तर पर कोई भी स्मरांजली तक नहीं होती है।
देश की स्वतंत्रता के 60 साल बीत जाने के बाद भी सीहोर का गौरवमयी स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास धूल की पर्तो में दबा हुआ है। हम कैसे भूल जायें कि सीहोर की वीर धरती पर भारत का पहला स्वतंत्रता आंदोलन सबसे दमदारी के साथ लड़ा गया था। हम कैसे भुला दें कि 6 अगस्त 1857 से लेकर 14 जनवरी 1858 तक पूरे 6 माह हम पूरे सीहोरवासी देश में एकमात्र स्वतंत्र थे इस गौरव को हम कैसे भूल सकते हैं....? हम कैसे भूल जायें कि यहाँ अंग्रेजों की छावनी में ही भारतीयों ने सारे अंग्रेजों को खदेड़कर भगा दिया था और सीहोर आजाद करा लिया था....? हम कैसे भूल जायें कि महावीर कोठ नामक क्रांतिकारी के नाम पर सीहोर में छ: माह तक महावीर कौंसिल के नाम से शासन हुआ और अंग्रेजों के झण्डे को उतारकर निशाने मोहम्मदी व निशाने महावीरी नामक दो झण्डे पूरे 6 माह तक हर दिन स्वतंत्रता की गौरवगाथा गाते हुए लहराते रहे....।
हम कैसे भूल जायें कि सीहोर में सिपाही बहादुर सरकार महावीर कौंसिल के संस्थापकों ने अंग्रेजों को मार-मारकर खदेड दिया था, मुगल सल्तनत व अंग्रेजों के झण्डे उखाड़ दिये थे...उन वीरों का स्मरण करना क्या आज भारतीयों का, हमारा कर्तव्य नहीं है।
14 जनवरी 1858 के कुछ दिनों पूर्व जनरल ह्यूरोज (जिसने झांसी की रानी लक्ष्मी से युध्द किया था) ने सीहोर आकर यहाँ की सिपाही बहादुर सरकार के वीर सिपाहियों को चारों तरफ घेर लिया था। उन्हे भोपाल की सिकन्दर जहाँ बेगम (खूनी बेगम)की सहायता से बंदी बना लिया गया और अंतत: उन्हे कैद में डाल दिया गया। फिर मांफी मांगने को कहा गया....।
लेकिन किसी भी वीर क्रांतिकारी ने अंग्रेजो से माफी नहीं मांगी। यह क्रांतिकारी कोई 3-4 या 10-12 नहीं थे वरन पूरे 356 से अधिक थे जिन्होने एक साथ कह दिया कि चाहे इस भारत माँ की गोद में सो जायेंगे लेकिन माफी नहीं मागेंगे....अपने धर्म से विमुख नहीं होंगे....(मांस लगे कारतूसों के खिलाफ) और क्रांतिकारियों ने सामुहिक रुप से माफी लिखकर नहीं मांगी अंतत: मजबूर होकर ह्यूरोज ने इतने अधिक लोगों को एक साथ मारने का फैसला करते हुए 14 जनवरी 1858 को 356 क्रांतिकारियों को गोलियों से भुनवा दिया.....। पूरे भारत में इससे बड़ा हत्याकाण्ड कभी नहीं घटा था।
कहा जाता है कि कुछ लोगों को सामुहिक रुप से फांसी भी दी गई क्योंकि ह्यूरोज को फांसी पर लटके क्रांतिकारियों के शव देखने में मजा आता था। एक साथ 356 सैनिकों के शवों का अंतिम संस्कार सीहोर की जनता ने फिर यहीं सीवन नदी के किनारे अलग-अलग स्थान पर करते हुए उनकी समाधियाँ बना दी। यही समाधियाँ आज भी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में स्थित हैं।
उन वीर सपूतों की शहादत को भूल गया है सीहोर। आजादी के बाद आये शासन ने स्वतंत्रता संग्राम के इन वीरों को सम्मान देने, उनका स्मरण करने की जहमत नहीं उठाई। हालांकि मध्य प्रदेश शासन संस्कृति विभाग, स्वराज संस्थान संचालनालय द्वारा सिपाही बहादुर के नाम से सीहोर की आजादी का स्वर्णिम इतिहास प्रकाशित कराया गया है लेकिन इसके बावजूद शासन ने इस तरफ गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। जिला प्रशासन सीहोर की पुरातत्व शाखा ने भी इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। जबकि पुरातत्व का एक संग्रहालय यहाँ बना हुआ है। विभाग बकायदा इसकी देखभाल करता है लेकिन इन जीर्ण-शीर्ण समाधियों की तरफ इसका ध्यान नहीं है। यहाँ शासन स्तर पर कोई भी स्मरांजली तक नहीं होती है।
मामूली बात पर जानलेवा हमला
सीहोर 9 जनवरी (फुरसत)। साधारण बात पर किये गये जानलेवा हमले में दो भाई गंभीर रूप से घायल हो गये जिन्हें हमीदिया अस्पताल भोपाल में भर्ती कराया गया है। आष्टा थाना पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर जांच पड़ताल शुरू कर दी है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार 6 जनवरी की शाम आष्टा थाने के ग्राम रूपेटा में साधारण सी बात को लेकर गजराज सिंह एवं उसके बड़े भाई रामप्रसाद के साथ कुल्हाड़ी से प्रहार कर जानलेवा हमले की घटना घटित की गई । बताया जाता है कि 6 जनवरी की शाम चार बजे ग्राम रूपेटा निवासी गजराज अपने खेत पर गया था जहां उसका बड़ा भाई रामप्रसाद पहले से मौजूद था । गजराज ने देखा कि उसके गेहूं के खेत में नायलोन का पाइप पड़ा था जो गांव के ही मांगीलाल तथा चैनसिंह ने अपने गेहूं के खेत में पानी ले जाने हेतू डाला था। गजराज द्वारा चेनसिंह से यह कहने पर कि उसके खेत में पाइप क्यों डाला इस पर चैनसिंह गाली गलौच करने लगा गजराज द्वारा गाली देने से मना करने पर चैनसिंह एवं पिन्टू कुल्हाड़ी लेकर आये और गजराज के सिर में मार दी जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया तभी गजराज का बड़ा भाई रामप्रसाद उसे बचाने दौडा जिसे मांगीलाल व राजेन्द्र ने पकड़ कर खेत की मेड़ पर रोक लिया और उस पर भी चैनसिंह और पिन्टु ने कुल्हाड़ी से प्रहार कर गंभीर रूप से घायल कर दिया। दोनों भाईयों को गंभीर अवस्था में इलाज के लिये आष्टा अस्प. लाया गया जहां से उन्हें हमीदिया अस्प. भोपाल भेजा गया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार 6 जनवरी की शाम आष्टा थाने के ग्राम रूपेटा में साधारण सी बात को लेकर गजराज सिंह एवं उसके बड़े भाई रामप्रसाद के साथ कुल्हाड़ी से प्रहार कर जानलेवा हमले की घटना घटित की गई । बताया जाता है कि 6 जनवरी की शाम चार बजे ग्राम रूपेटा निवासी गजराज अपने खेत पर गया था जहां उसका बड़ा भाई रामप्रसाद पहले से मौजूद था । गजराज ने देखा कि उसके गेहूं के खेत में नायलोन का पाइप पड़ा था जो गांव के ही मांगीलाल तथा चैनसिंह ने अपने गेहूं के खेत में पानी ले जाने हेतू डाला था। गजराज द्वारा चेनसिंह से यह कहने पर कि उसके खेत में पाइप क्यों डाला इस पर चैनसिंह गाली गलौच करने लगा गजराज द्वारा गाली देने से मना करने पर चैनसिंह एवं पिन्टू कुल्हाड़ी लेकर आये और गजराज के सिर में मार दी जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया तभी गजराज का बड़ा भाई रामप्रसाद उसे बचाने दौडा जिसे मांगीलाल व राजेन्द्र ने पकड़ कर खेत की मेड़ पर रोक लिया और उस पर भी चैनसिंह और पिन्टु ने कुल्हाड़ी से प्रहार कर गंभीर रूप से घायल कर दिया। दोनों भाईयों को गंभीर अवस्था में इलाज के लिये आष्टा अस्प. लाया गया जहां से उन्हें हमीदिया अस्प. भोपाल भेजा गया।
Thursday, January 10, 2008
शीर्षस्थ लोगों को बड़ी परीक्षाएं देनी पड़ती हैं - अवधेशानंद जी
आष्टा 8 जनवरी (फुरसत)। बड़े लोगों की, शीर्ष लोगों की भिन्न-भिन्न तरीके से परीक्षाऐं ली जाती हैं। परीक्षित के तीन अर्थ होते हैं पहला जिसके लिए लम्बे समय से प्रतीक्षा की जाऐ, दूसरा जिसको परीक्षा देनी पड़े और तीसरा जो पराशक्तियों द्वारा रक्षित हो। शीर्षस्थ लोगों के दास कभी भी बिना अनुमति के शस्त्र नहीं उठाते हैं, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र दो बार बिना आज्ञा के चल पड़ा था। पहला जब दुर्वासा व अम्बरीष पर संकट आया और दूसरा जब अश्वत्थामा ने पांडवों के नाश के लिए ब्रम्हास्त्र चलाया। इस संसार में जीव को चार भागों में बांटा गया हैं जड़, वनस्पति, पषु और मनुष्य। जिसमें मानव जीवन सर्वोत्तम हैं।
यह प्रखर और औजस्वी विचार आष्टा में आयोजित श्रीमद् भागवत् कथा के दूसरे दिन महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज ने व्यक्त किए। स्वामी जी राजा परीक्षित का जन्म और युधिष्ठिर को ज्ञानानुभूति प्रसंग पर सारगर्भित उद्बोधन दे रहे थे। स्वामी जी ने कहा कि परीक्षित अर्थात् जिसके लिए प्रतीक्षा की जाती हैं, ऐसे समय की, लोगों की, युग की जो निराषा को ध्वस्त कर दे विचार को फैला दे यह सब जो कर दे वह परीक्षित हैं। बड़े-बड़े लोगों को भिन्न-भिन्न तरीके से बड़ी-बड़ी परीक्षाऐं देनी होती हैं उन्हें अपनी उपयोगिता को, आवश्यकता को सिध्द करना होता हैं, हर समय और संकट की घड़ी में भी। दूसरा परीक्षित जो कि पराषक्तियों द्वारा रक्षित हो, बड़ी-बड़ी शक्तियाँ जिसकी रक्षा करती हों। ऐसी शक्तियाँ जो छुपकर किसी की रक्षा करें वह परीक्षित हैं। पष्चिमी देषों ने चाहे जितनी उन्नत कोटि के दूरबीन या मिसाईल बना ली हो, लेकिन भारत के पास जो सूक्ष्म से सूक्ष्म चीजों व बातों को देखने की दृष्टि हैं वह आध्यात्म दृष्टि तो वह मात्र भारत के पास ही हैं पश्चिमी देषों के पास नहीं। तभी तो परीक्षित को उनके गुरूजी ने बतला दिया था कि मृत्यु आऐगी दिन में कभी भी।
स्वामी जी ने कहा कि चार प्रकार के संवाद होते हैं सूद व स्वामी का, विवेक व मैत्री का, कृष्ण व उध्दव का और सुख व परीक्षित का। जिस शिष्य का गुरू के प्रति पूर्ण समर्पण हैं उसे संवाद की आवश्यकता नहीं होती हैं, इसीलिए तो कहा जाता है कि गुरू से 5 चीजें बार-बार न पूछें - पहला कब, दूसरा कौन, तीसरा कैसे, चौथा कहाँ और पाँचवा क्या। इस बीच पूज्य स्वामी जी ने सुमधुर गीत संगीत के साथ गुरू गोविन्द माधव भज मन हरे.......और छूम छूम छननन बाजे मैया पाँव पैजनिया......भजन से श्रध्दालुओं को सम्मोहित कर लिया। साथ ही पूज्य प्रवर ने संत चरित्र पर तुलसीदास की चौपाई का सस्वर पाठ किया, अपनी कथा मण्डली के दक्ष साथियों के साथ स्वामीजी ने राग मालकोष, राग जय जय वंती, और राग यमन पर गान कर श्रध्दालुओं को हर्षोल्लासित कर दिया। स्वामी जी ने कहा कि इस संसार लोक में जीव को चार भागों में बांटा गया हैं और यह संसार इन्हीं चार जीवों के आसपास ही चलता हैं। पहला जड़ जिसमें धूल, पत्थर आते हैं जो सुप्त हैं यहाँ पर जाग्रति नाम की कोई चीज नहीं हैं। दूसरा वनस्पतियाँ जहाँ पर जाग्रति हैं, संचार हैं लेकिन यह बोल नहीं सकती। तीसरा संसार के पशु-पक्षी जो बोल सकते हैं लेकिन उन्हें हम समझ नहीं सकते लेकिन मानव जीवन ऐसा जीवन हैं जो कर्म, विचार, चिंतन, अभिव्यक्ति आदि से परिपूर्ण हैं। मनुष्य जीवन इन चारों जीवों में सर्वोत्तम हैं जो सुन सकता हैं, देख सकता हैं, अभिव्यक्त कर सकता हैं। इन चारों जीवों का काम एक ही हैं आहार, निद्रा, भय और परिवार वृध्दि (मैथुन) लेकिन मनुष्य इससे हटकर भी सत्य का अनुभव करता हैं उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त हैं, इसीलिए वह अपना उत्थान कर सकता हैं, जीवन सार्थक कर सकता हैं। इसलिए मनुष्य को भगवान के स्फूर्त रूप का ध्यान करना चाहिए। भगवान के रूप, लीला, नाम व धाम से मन को जोड़ना चाहिए।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि यह समूचा जगत ज्ञान व वेदों द्वारा नकारा गया हैं। साकार रूप में दिखने वाले प्रकृति रूप यह सब छलावा हैं, सच तो मात्र काल हैं, मृत्यु है क्योंकि यह मृत्युलोक हैं। क्योंकि मन, बुध्दि, चित्त द्वारा जो अनुभव होता हैं वह नाशवान हैं और असत्य हैं। इसीलिए तो प्रार्थना की गई हैं असतो मा सद् गमय.....। मानव तन दुर्लभ जरूर हैं लेकिन यह क्षण भंगुर हैं। यह मिटने वाला हैं इसे माया भाषित होती हैं अनुभव होती हैं लेकिन दिखती नहीं हैं। जिस तरीके से सपने में धन, कीर्ति, सुख, दुख, शीर्षस्थ पद् पर आसीन हो जाना सब कुछ मिल जाता हैं लेकिन सपना टूटते ही सारे सुख दुख समाप्त हो जाते हैं उनका यथार्थ जीवन से कोई रिष्ता नहीं रहता हैं। कथा का अर्थ तो यही हैं कि हम सबको अमृत प्राप्त हो ज्ञान प्राप्त हो।
स्वामी जी ने कहा संत के विचार से, ज्ञान से, अध्ययन से आपको सुखानुभूति प्राप्त होगी, जिस तरह से उत्तरा के पुत्र के जन्म से जो सुख युधिष्ठिर को मिला। साधना की पहली सीढ़ी का पहला कदम तप से हैं। संत के दर्शन का मतलब तप की प्रेरणा हैं क्योंकि वे तप करते हैं उन्हें मालूम हैं कि कैसे किसको किस रूप में ढालना हैं वे इस संसार को नियंत्रित करते हैं। जिस तरीके से ऊंट को नियंत्रित किया जाता हैं नकेल से, घोड़े को नियंत्रित किया जाता है लगाम से, हाथी को महावत नियंत्रित करता हैं अंकुश से। जब हमारा मन अति अभिमानी, अति असंयमशील भ्रष्ट और भ्रम के ताने बाने में उलझ जाऐं तब तप सबसे बड़ा शस्त्र हैं। पहला तप आहार विहार की शुचिता से मिलता हैं जिस साधक के पास आहार विहार की शुचिता नहीं वह साधना नहीं कर सकता हैं। साधु संतों के पास आहार विहार की बड़ी शुचिता होती हैं उनका भोजन ग्रहण, मनन, चिंतन, कहना और सुनना बड़ा संयत होता हैं। तब ही तो दर्षन की चरम स्थिति पर पहुँचे ऋषियों मुनियों ने जगत के पदार्थों का विश्लेषण कर इन्हें परिवर्तनषील और क्षण भंगुर बताया हैं। उन्होनें समूची सत्ता को मिथ्या कहा हैं। वेदों में भी इस बात का विवरण मिलता हैं। सत्य तो सिर्फ यही हैं ब्रम्ह सत्य..... जगत मिथ्या। जब मनुष्य मन स्वप्न के विकारों से, दूषित सपनों से मुक्त हो जाता हैं तब ही उसे मुक्ति मिलेगी और यह मुक्ति आपको दिलवाऐगी एकांत शैली। यह एकांत शैली मानव मन को स्थिर रखता हैं। सच्चे साधक के लिए तो यह जरूरी है कि वह संसार में अंधा, गूंगा व लंगड़ा बनकर रहे। स्वामी जी ने अपनी कथा को भारत माँ तेरी जय जय जय.....सुमधुर गीत के साथ प्रारम्भ किया। स्वामी जी ने आस्था नगरी (आष्टा) की प्रषंसा में कहा कि जहाँ पर ओंकारेश्वर का अनुग्रह, महाकालेश्वर की अनुकम्पा और पार्वती का पुण्य साक्षात् प्राप्त हो रहा हो ऐसी आष्टा नगरी चिन्मयधाम हैं, गोकुलधाम हैं। ऐसे वृहद आयोजन के लिए आष्टा के प्रथम नागरिक भाई कैलाश परमार बधाई के पात्र हैं। इसके पूर्व स्वामी जी का पुष्प गुच्छ से अभिनन्दन करने वालों में भोजमुक्त वि.वि. के कुलपति डाँ. कमलाकर, इन्दर सिंह परमार, राजमल जैन, कृपाल सिंह पटाड़ा, श्रीराम परमार रणजीत सिंह गुणवान, देवीसिंह परमार, दयाषंकर माथुर, योगेन्द्र सिंह मेवाड़ा, सतीष चन्द्र डोंगरे, महेश परमार भटोनी, नरेन्द्र सिंह ठाकुर, ओंकारसिंह ठाकुर एवं अन्य श्रध्दालु उपस्थित थे।
यह प्रखर और औजस्वी विचार आष्टा में आयोजित श्रीमद् भागवत् कथा के दूसरे दिन महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज ने व्यक्त किए। स्वामी जी राजा परीक्षित का जन्म और युधिष्ठिर को ज्ञानानुभूति प्रसंग पर सारगर्भित उद्बोधन दे रहे थे। स्वामी जी ने कहा कि परीक्षित अर्थात् जिसके लिए प्रतीक्षा की जाती हैं, ऐसे समय की, लोगों की, युग की जो निराषा को ध्वस्त कर दे विचार को फैला दे यह सब जो कर दे वह परीक्षित हैं। बड़े-बड़े लोगों को भिन्न-भिन्न तरीके से बड़ी-बड़ी परीक्षाऐं देनी होती हैं उन्हें अपनी उपयोगिता को, आवश्यकता को सिध्द करना होता हैं, हर समय और संकट की घड़ी में भी। दूसरा परीक्षित जो कि पराषक्तियों द्वारा रक्षित हो, बड़ी-बड़ी शक्तियाँ जिसकी रक्षा करती हों। ऐसी शक्तियाँ जो छुपकर किसी की रक्षा करें वह परीक्षित हैं। पष्चिमी देषों ने चाहे जितनी उन्नत कोटि के दूरबीन या मिसाईल बना ली हो, लेकिन भारत के पास जो सूक्ष्म से सूक्ष्म चीजों व बातों को देखने की दृष्टि हैं वह आध्यात्म दृष्टि तो वह मात्र भारत के पास ही हैं पश्चिमी देषों के पास नहीं। तभी तो परीक्षित को उनके गुरूजी ने बतला दिया था कि मृत्यु आऐगी दिन में कभी भी।
स्वामी जी ने कहा कि चार प्रकार के संवाद होते हैं सूद व स्वामी का, विवेक व मैत्री का, कृष्ण व उध्दव का और सुख व परीक्षित का। जिस शिष्य का गुरू के प्रति पूर्ण समर्पण हैं उसे संवाद की आवश्यकता नहीं होती हैं, इसीलिए तो कहा जाता है कि गुरू से 5 चीजें बार-बार न पूछें - पहला कब, दूसरा कौन, तीसरा कैसे, चौथा कहाँ और पाँचवा क्या। इस बीच पूज्य स्वामी जी ने सुमधुर गीत संगीत के साथ गुरू गोविन्द माधव भज मन हरे.......और छूम छूम छननन बाजे मैया पाँव पैजनिया......भजन से श्रध्दालुओं को सम्मोहित कर लिया। साथ ही पूज्य प्रवर ने संत चरित्र पर तुलसीदास की चौपाई का सस्वर पाठ किया, अपनी कथा मण्डली के दक्ष साथियों के साथ स्वामीजी ने राग मालकोष, राग जय जय वंती, और राग यमन पर गान कर श्रध्दालुओं को हर्षोल्लासित कर दिया। स्वामी जी ने कहा कि इस संसार लोक में जीव को चार भागों में बांटा गया हैं और यह संसार इन्हीं चार जीवों के आसपास ही चलता हैं। पहला जड़ जिसमें धूल, पत्थर आते हैं जो सुप्त हैं यहाँ पर जाग्रति नाम की कोई चीज नहीं हैं। दूसरा वनस्पतियाँ जहाँ पर जाग्रति हैं, संचार हैं लेकिन यह बोल नहीं सकती। तीसरा संसार के पशु-पक्षी जो बोल सकते हैं लेकिन उन्हें हम समझ नहीं सकते लेकिन मानव जीवन ऐसा जीवन हैं जो कर्म, विचार, चिंतन, अभिव्यक्ति आदि से परिपूर्ण हैं। मनुष्य जीवन इन चारों जीवों में सर्वोत्तम हैं जो सुन सकता हैं, देख सकता हैं, अभिव्यक्त कर सकता हैं। इन चारों जीवों का काम एक ही हैं आहार, निद्रा, भय और परिवार वृध्दि (मैथुन) लेकिन मनुष्य इससे हटकर भी सत्य का अनुभव करता हैं उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त हैं, इसीलिए वह अपना उत्थान कर सकता हैं, जीवन सार्थक कर सकता हैं। इसलिए मनुष्य को भगवान के स्फूर्त रूप का ध्यान करना चाहिए। भगवान के रूप, लीला, नाम व धाम से मन को जोड़ना चाहिए।
पूज्य स्वामी जी ने कहा कि यह समूचा जगत ज्ञान व वेदों द्वारा नकारा गया हैं। साकार रूप में दिखने वाले प्रकृति रूप यह सब छलावा हैं, सच तो मात्र काल हैं, मृत्यु है क्योंकि यह मृत्युलोक हैं। क्योंकि मन, बुध्दि, चित्त द्वारा जो अनुभव होता हैं वह नाशवान हैं और असत्य हैं। इसीलिए तो प्रार्थना की गई हैं असतो मा सद् गमय.....। मानव तन दुर्लभ जरूर हैं लेकिन यह क्षण भंगुर हैं। यह मिटने वाला हैं इसे माया भाषित होती हैं अनुभव होती हैं लेकिन दिखती नहीं हैं। जिस तरीके से सपने में धन, कीर्ति, सुख, दुख, शीर्षस्थ पद् पर आसीन हो जाना सब कुछ मिल जाता हैं लेकिन सपना टूटते ही सारे सुख दुख समाप्त हो जाते हैं उनका यथार्थ जीवन से कोई रिष्ता नहीं रहता हैं। कथा का अर्थ तो यही हैं कि हम सबको अमृत प्राप्त हो ज्ञान प्राप्त हो।
स्वामी जी ने कहा संत के विचार से, ज्ञान से, अध्ययन से आपको सुखानुभूति प्राप्त होगी, जिस तरह से उत्तरा के पुत्र के जन्म से जो सुख युधिष्ठिर को मिला। साधना की पहली सीढ़ी का पहला कदम तप से हैं। संत के दर्शन का मतलब तप की प्रेरणा हैं क्योंकि वे तप करते हैं उन्हें मालूम हैं कि कैसे किसको किस रूप में ढालना हैं वे इस संसार को नियंत्रित करते हैं। जिस तरीके से ऊंट को नियंत्रित किया जाता हैं नकेल से, घोड़े को नियंत्रित किया जाता है लगाम से, हाथी को महावत नियंत्रित करता हैं अंकुश से। जब हमारा मन अति अभिमानी, अति असंयमशील भ्रष्ट और भ्रम के ताने बाने में उलझ जाऐं तब तप सबसे बड़ा शस्त्र हैं। पहला तप आहार विहार की शुचिता से मिलता हैं जिस साधक के पास आहार विहार की शुचिता नहीं वह साधना नहीं कर सकता हैं। साधु संतों के पास आहार विहार की बड़ी शुचिता होती हैं उनका भोजन ग्रहण, मनन, चिंतन, कहना और सुनना बड़ा संयत होता हैं। तब ही तो दर्षन की चरम स्थिति पर पहुँचे ऋषियों मुनियों ने जगत के पदार्थों का विश्लेषण कर इन्हें परिवर्तनषील और क्षण भंगुर बताया हैं। उन्होनें समूची सत्ता को मिथ्या कहा हैं। वेदों में भी इस बात का विवरण मिलता हैं। सत्य तो सिर्फ यही हैं ब्रम्ह सत्य..... जगत मिथ्या। जब मनुष्य मन स्वप्न के विकारों से, दूषित सपनों से मुक्त हो जाता हैं तब ही उसे मुक्ति मिलेगी और यह मुक्ति आपको दिलवाऐगी एकांत शैली। यह एकांत शैली मानव मन को स्थिर रखता हैं। सच्चे साधक के लिए तो यह जरूरी है कि वह संसार में अंधा, गूंगा व लंगड़ा बनकर रहे। स्वामी जी ने अपनी कथा को भारत माँ तेरी जय जय जय.....सुमधुर गीत के साथ प्रारम्भ किया। स्वामी जी ने आस्था नगरी (आष्टा) की प्रषंसा में कहा कि जहाँ पर ओंकारेश्वर का अनुग्रह, महाकालेश्वर की अनुकम्पा और पार्वती का पुण्य साक्षात् प्राप्त हो रहा हो ऐसी आष्टा नगरी चिन्मयधाम हैं, गोकुलधाम हैं। ऐसे वृहद आयोजन के लिए आष्टा के प्रथम नागरिक भाई कैलाश परमार बधाई के पात्र हैं। इसके पूर्व स्वामी जी का पुष्प गुच्छ से अभिनन्दन करने वालों में भोजमुक्त वि.वि. के कुलपति डाँ. कमलाकर, इन्दर सिंह परमार, राजमल जैन, कृपाल सिंह पटाड़ा, श्रीराम परमार रणजीत सिंह गुणवान, देवीसिंह परमार, दयाषंकर माथुर, योगेन्द्र सिंह मेवाड़ा, सतीष चन्द्र डोंगरे, महेश परमार भटोनी, नरेन्द्र सिंह ठाकुर, ओंकारसिंह ठाकुर एवं अन्य श्रध्दालु उपस्थित थे।
विवेक की छैनी और संयमरूपी हथौडा जीवन का सही निर्माण करेगा-अवधेशानन्द जी
आष्टा 8 जनवरी (फुरसत)। विवेक की छैनी, संयम का हथौड़ा और सद्गुण की उर्वरा अगर मिल जाऐ तो निर्माण होकर रहेगा। हम जब जीवन के प्रति गंभीर होंगे तब ही जीवन सफल होगा । दीया और बाती प्रकाश नही फैला सकते उसके लिए भी प्रकाश के संसर्ग की आवश्यता होती हैं तब ही उजास होता है । अन्त:करण रूपी मन जब आध्यात्म और भागवत् रूपी प्रकाश के संसर्ग में आयेगा तब मनुष्य जीवन प्रकाश मान होकर रहेगा। े
उक्त प्रेरक उद्गार पूज्य प्रवर आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज ने मां पार्वती की नगरी में भागवत् कथा श्रवण करवाते हुए प्रथम दिन व्यक्त किए । स्वामी जी ने कहा आध्यात्म अर्थात स्वंय की ओर ले जाने, स्वंय को जानने, पहचानने और जागृत करने का नाम है, जो मनुष्य को संचेतन, स्वंय के प्रति जागृत कर इंद्रीय संयम का बल प्रदान करता है। हमारे अंदर ईश्वरीय सत्ता विद्यमान है, वह जागृत नही होती है और इसे जागृत करने के लिए आध्यात्म और भागवत सबसे सरल उपाय है। इसके पूर्व व्यास पीठ का विजेन्द्र कुमार पालीवाल ने सपत्निक पूजन किया, लक्ष्मीनारायण वर्मा, शिरडी के सांसद बी.के.पाटिल आदि ने भी व्यास पीठ का पूजन किया। दीप प्रावलित के बाद स्वामी जी के चरणों में अध्यक्ष ओमप्रकाश सोनी, स्वागत अध्यक्ष प्रेमनारायण गौस्वामी, विजय देशलहरा, ललित अग्रवाल, सुरेश पालीवाल, भवानी शंकर शर्मा, कमलसिंह ठाकूर, ओमप्रकाश गुप्ता, उमेश जैन, राजेन्द्र सिंह, शिवनारायण पटेल, अशोक राठौर, पत्रकार प्रदीप चौहान, नरेन्द्र गंगवाल, ने पुष्प गुच्छ भेट पुष्पांजलि अर्पित की ।
पूज्य स्वामी ने कहा कि पहला साधन सुनने की कला है । निरन्तर सुनने और मनन करने से हमारे अन्तकरण की भूमि योग्य बनती है तब ही हम पात्र बनते है । वासना रूपी जड़ को काटने के लिए सत्संग से बल मिलता है, सत्संग हमें ऊर्जा देता है। संग्रह, संचय हम कितना ही कर ले लेकिन इसमें पूर्णता नही है । जिस तरीके से प्रकृति भी पल-पल परिवर्तनशील है, संसार के पदार्थो में पूर्णता नही है । स्वामी जी ने कहा कि शास्त्र, संत, वेद, पुराण में कहा गया है कि पदार्थ अधूरे है जितने भी चाहे भंडारण कर लो यह जीवन का स्थायी समाधान नही है ।
कथा की शुरूआत भारत मां तेरी जय-जय-जय ..... गीत के साथ करते हुए स्वामी जी ने कहा कि मां पार्वती की आस्था नगरी जहां पर पार्वती का प्रवाह, नर्मदा का नैकटय एवं क्षिप्रा की समीपता है। यह संस्कारित और पावन आस्था नगरी जहां के खेत खलिहानो में हरितिमा, उर्वरा, श्रम की सार्थकता, मानस में निश्छलता और चित्त में धर्म ग्राह्यता ऐसी संपन्न भूमि पर भागवत कथा का आयोजन कर वयोवृद्ध लक्ष्मी नारायण जी नगर के प्रथम नागरिक कैलाश परमार और प्रभु प्रेमियों ने आनन्द विभोर करने वाला कार्य किया है । स्वामी जी ने बीच-बीच में सुमधुर गीतो के माध्यम से भागवत कथा का आकर्षण दुगना कर दिया। कथा श्रवण करने के लिए प्रथम दिन म.प्र. के पूर्व मंत्री व विधायक अजयसिंह पधारे। आष्टा क्षैंत्र के विभिन्न ग्रामों से भी आपार जन समूह ने भी अमृत वचनों को ग्रहण किया।
उक्त प्रेरक उद्गार पूज्य प्रवर आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज ने मां पार्वती की नगरी में भागवत् कथा श्रवण करवाते हुए प्रथम दिन व्यक्त किए । स्वामी जी ने कहा आध्यात्म अर्थात स्वंय की ओर ले जाने, स्वंय को जानने, पहचानने और जागृत करने का नाम है, जो मनुष्य को संचेतन, स्वंय के प्रति जागृत कर इंद्रीय संयम का बल प्रदान करता है। हमारे अंदर ईश्वरीय सत्ता विद्यमान है, वह जागृत नही होती है और इसे जागृत करने के लिए आध्यात्म और भागवत सबसे सरल उपाय है। इसके पूर्व व्यास पीठ का विजेन्द्र कुमार पालीवाल ने सपत्निक पूजन किया, लक्ष्मीनारायण वर्मा, शिरडी के सांसद बी.के.पाटिल आदि ने भी व्यास पीठ का पूजन किया। दीप प्रावलित के बाद स्वामी जी के चरणों में अध्यक्ष ओमप्रकाश सोनी, स्वागत अध्यक्ष प्रेमनारायण गौस्वामी, विजय देशलहरा, ललित अग्रवाल, सुरेश पालीवाल, भवानी शंकर शर्मा, कमलसिंह ठाकूर, ओमप्रकाश गुप्ता, उमेश जैन, राजेन्द्र सिंह, शिवनारायण पटेल, अशोक राठौर, पत्रकार प्रदीप चौहान, नरेन्द्र गंगवाल, ने पुष्प गुच्छ भेट पुष्पांजलि अर्पित की ।
पूज्य स्वामी ने कहा कि पहला साधन सुनने की कला है । निरन्तर सुनने और मनन करने से हमारे अन्तकरण की भूमि योग्य बनती है तब ही हम पात्र बनते है । वासना रूपी जड़ को काटने के लिए सत्संग से बल मिलता है, सत्संग हमें ऊर्जा देता है। संग्रह, संचय हम कितना ही कर ले लेकिन इसमें पूर्णता नही है । जिस तरीके से प्रकृति भी पल-पल परिवर्तनशील है, संसार के पदार्थो में पूर्णता नही है । स्वामी जी ने कहा कि शास्त्र, संत, वेद, पुराण में कहा गया है कि पदार्थ अधूरे है जितने भी चाहे भंडारण कर लो यह जीवन का स्थायी समाधान नही है ।
कथा की शुरूआत भारत मां तेरी जय-जय-जय ..... गीत के साथ करते हुए स्वामी जी ने कहा कि मां पार्वती की आस्था नगरी जहां पर पार्वती का प्रवाह, नर्मदा का नैकटय एवं क्षिप्रा की समीपता है। यह संस्कारित और पावन आस्था नगरी जहां के खेत खलिहानो में हरितिमा, उर्वरा, श्रम की सार्थकता, मानस में निश्छलता और चित्त में धर्म ग्राह्यता ऐसी संपन्न भूमि पर भागवत कथा का आयोजन कर वयोवृद्ध लक्ष्मी नारायण जी नगर के प्रथम नागरिक कैलाश परमार और प्रभु प्रेमियों ने आनन्द विभोर करने वाला कार्य किया है । स्वामी जी ने बीच-बीच में सुमधुर गीतो के माध्यम से भागवत कथा का आकर्षण दुगना कर दिया। कथा श्रवण करने के लिए प्रथम दिन म.प्र. के पूर्व मंत्री व विधायक अजयसिंह पधारे। आष्टा क्षैंत्र के विभिन्न ग्रामों से भी आपार जन समूह ने भी अमृत वचनों को ग्रहण किया।
मैं मंत्री का साला हूँ सबका ट्रांसफार्मर क रवा दूंगा
आष्टा 8 जनवरी (फुरसत)। आष्टा इन्दौर-भोपाल मार्ग पर इन दिनो रोड की एक और नाली खुदाई कर उसमें केवल डालने का कार्य चल रहा है जो नाली खुदाई कर रहे हैं वे कार्य इस तरह कर रहे हैं कि उससे व्यवस्थाएं बिगड़ रही है। अलीपुर क्षेत्र में नालियाँ इस प्रकार लापरवाही पूर्वक खोदी जा रही है कि इस क्षेत्र में जल प्रदाय की पाईप लाईन कई जगह से फूट गई है जब कार्य करने वालों से कहा गया तो इसके जो ठेकेदार है वे यह भूल गये की वे ठेकेदार हैं बस उन्हे शायद यह याद रहा है कि वे एक मंत्री के साले हैं और उन्होने आई शिकायत को गंभीरता से लेने के बदले जिन लोगों ने उनसे कहा उन्हे यह धमकी दे डाली की अब अगर शिकायत की तो तुम सबका ट्रांसफार्मर करवा दूंगा तुम्हे मालुम नहीं है कि मैं मंत्री का साला हूँ साले साहब आप मंत्री जी के साले हैं इसका यह मतलब तो नहीं की उनकी आड़ में आप मनमानी करें। ऐसा करके आप मंत्री जी का भला नहीं उनका बुरा ही कर रहे हैं। ऐसे ठेकेदार पर नगर पालिका को उसकी सम्पत्ति नष्ट करने एवं व्यवस्थाओं को भंग करने के बदले कार्यवाही करना चाहिए। अलीपुर के दो पार्षदों ने नगर पालिका को इसकी शिकायत की है।
Tuesday, January 8, 2008
सीहोर में 356 शहीद क्रांतिकारियों की समाधि पर कोई फूल चढ़ाने वाला नहीं
सिपाही बहादुर सरकार के क्रांतिकारियों को भूल गया सीहोर
14 जनवरी 1857 का वह दिन सीहोर कैसे भूल सकता है जब यहाँ के रणबांकुरे सैनिकों ने सिपाही बहादुर सरकार का गठन कर अंग्रेजों को सीहोर से ही खदेड़कर बाहर निकाल दिया था और झण्डा-ए- महावीरी और निशाने मोहम्मदी को फहरा दिया गया था। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे पहले बिगुल फूंकने वाले सीहोर नगर के इतिहास के पृष्ठों पर ''सिपाही बहादुर सरकार'' का अमिट इतिहास आज भी नई पीढ़ी को देश के उन रणबांकुरों के प्रति नतमस्तक किये हुए हैं।
फिर भी सीहोर के इतिहास को मध्य प्रदेश शासन के इतिहास संबंधी विभागों द्वारा विशेष मान्यता तो दी गई लेकिन कभी यहाँ ऐतिहासिक स्मारकों और जीर्ण-शीर्ण हो रहे अवशेषों की तरफ मध्य प्रदेश शासन ने ध्यान नहीं दिया। जबकि सीहोर का इतिहास पूरे देश की जंगे आजादी की लड़ाई में सबसे अमिट और तेजस्वी स्वरूप लिये हुए है।
इस संबंध में उर्दू में प्रकाशित ऐतिहासिक पुस्तक ''सिपाही बहादुर'' जो भोपाल के प्रसिध्द इतिहासकार और स्वतंत्रता संग्राम सैनानी श्री असद उल्ला खाँ साहब द्वारा लिखी गई थी। इस किताब की पृष्ठभूमि में ही स्वयं असलउल्ला खां साहब ने लिखा है कि ''1857 के स्वतंत्रता संग्राम के तूफान के आगे अंग्रेजों के कदम लगभग उखड़ चुके थे और हर तरफ अंग्रेज बेसहारा बनकर बदहवासी में पागलों की तरफ फिर रहे थे, इन परिस्थितियों में भोपाल कन्टिनजेन्ट के बाग़ी सिपाहियों ने 'वली शाह रिसालदार' के नेतृत्व में 6 अगस्त 1857 को सीहोर में अंग्रेजों की सत्ता के खिलाफ बग़ावत का झण्डा बुलंद किया। उन्होने बैरसिया और सीहोर में अंग्रेजों के बंगलों को आग लगा दी। बैरसिया में जो अंग्रेज थे उनको कत्ल कर दिया । सरकारी खजाने लूट लिया । इसके फौरन बाद उन्होने अपनी एक सरकार ''सिपाही बहादुर'' के नाम स्थापित की । उन्होने जगह-जगह इस नई सरकार के झण्डे गाड़ दिये और मुसलमानों, हिन्दुओं से अपील की कि वो इस नई सरकार के हाथ मजबूत करें । उन्होने अपनी सरकार के तहत विभिन्न प्रशासनिक कार्यालय भ्ज्ञी स्थापित करना प्रारंभ कर दिये । भोपाल की बगावत कई एतबार से मध्यभारत और मालवा की बग़ावतों से भिन्न थी क्योंकि भोपाल के बागियों ने भोपाल की बग़ावत को एक बा-मकसद और मजबूत शक्ल देने की समझदार कोशिश की थी । ये एक क्रांतिकारी कदम था जिसमें हिन्दुस्तान से अंग्रेजों को निकालकर शासन की बागडोर हिन्दुस्तानी जनता के हाथों में देने का इरादा सम्मिलित था। इस 'सिपाही बहादुर सरकार' को स्थापित करने वाले सीहोर फौज के चार वतनपरस्त बहादुर अफसर थे। जिस फ़ौज का नाम भोपाल कन्टिनजेंट था। भोपाल राज्य में ये पहली समानान्तर सरकार थी जो अंग्रेजी सरकार के खिलाफ स्थापित हुई थी। जिस समय ये सरकार स्थापित हुई उस वक्त उसके संस्थापक फ़ौज के एक अफसर बाग़ी रिसालदार वली शाह थे। उन्होने इस सरकार की स्थापना के समय बाग़ी फौजियों को रियासत भोपाल के पॉलिटिक एजेन्ट मेजर हैनरी विलियम के कार्यालय जो सीहोर में स्थित था के पास जमा करने के बाद उनके सामने एक वलवला अंगेज और जोशीली तकरीर की थी । वली शाह के साथ तीन अफ़सर जो उस बग़ावत के नेता थे उनके नाम हैं आरिफ शाह, महावीर और रमजू लाल।''
इस प्रकार इतिहास के पृष्ठों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि सीहोर में सिपाही बहादुर सरकार का न केवल गठन हुआ था बल्कि इस बहादुर सरकार ने यहाँ से अंग्रेजों को खदेड़ भी दिया था लेकिन भोपाल रियासत की बेगम की मिली भगत के चलते अंग्रेजों ने सिपाही बहादुर सरकार में शामिल 356 सिपाहियों को गोलियों से उड़ा दिया था। इस संदर्भ में भी देश की विभिन्न ऐतिहासिक किताबों में उल्लेख मिलता है जैसे 'हयाते सिकन्दरी' जिसके संपादक जनरल उबैद उल्ला खाँ, नवाब सुल्तान जहाँ बेगम हैं के पृष्ठ क्रमांक 56, 'भोपाल स्टेट गजेटियर' के पृष्ठ 122 पर सहित अन्य किताबों में भी इस घटना का उल्लेख स्पष्ट रूप से उल्लेखित है।
सिपाही बहादुर सरकार के देशभक्त सैनिकों को सामुहिक रूप से कत्ल कर दिया गया था । ''सिपाही बहादुर'' नामक उर्दू में प्रकाशित ऐतिहासिक पुस्तक में एक जगह स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि ''जनरल रोज़ बहुत तानाशाह व्यक्ति था, इसके अतिरिक्त वह हिन्दुस्तान के राष्ट्रवादियों के खून का प्यासा था। उसने हालात की जानकारी प्राप्त करने के पश्चात यह निर्णय लिया कि बाग़ियों को सजा-ए-मौत दे दी जाये। अत: 14 जनवरी 1858 को सीहोर के सैकड़ो राष्ट्रवादी कैदियों को जेल से निकाला गया और एक मैदान में लाकर खड़ाकर दिया गया । यहाँ उनकी छोटी- छोटी टुकड़ियाँ बनाकर गोलियों से भून डाला गया। इस प्रकार 356 कैदियों को बिना किसी नियमित जाँच के गोलियों से उड़ा दिया गया। इसके अतिरिक्त सैकड़ों कैदियों को सेवा से पृथक किया गया और सीमाओं के बाहर कर दिया गया। इन बहादुर फोजियों ने सजा-ए-मौत से बचने के लिये माफ़ी का कोई निवेदन नहीं किया । उन्होने वतन की आजादी के लिये सरकार से समझौता करने के बजाय अत्याधिक दिलेरी से मौत को गले लगा लिया । इस प्रकार 'सिपाही बहादुर' के दीवानों ने सारी दुनिया को हमेशा के लिये ये रास्ता दिखा दिया कि देश और कौम की आजादी के लिये किस प्रकार सच्चे सिपाही अपनी जानों को भेंट स्वरूप प्रस्तुत करते हैं।''
सीहोर के लिये यह गौरव की बात है कि यहाँ के बहादुर सैनिकों ने 'सिपाही बहादुर' सरकार का गठन कर अंग्रेजों को सीहोर से खदेड़ दिया था और अंत तक अंग्रेजों के आगे वह झुके नहीं। आज भी इन बहादुर सिपाहियों की अनेक समाधियाँ बनी हुई हैं जो अब जीर्ण-शीर्ण स्थिति में आ गई हैं लेकिन मध्य प्रदेश शासन ने कभी इन स्मारकों को सहेजने के लिये इसके प्रति गंभीरता से कदम नहीं उठाये।
स्थानीय जिला प्रशासन ने भी इस तरफ कभी ध्यान नहीं देता। पिछले कुछ समय से बसंत उत्सव समिति द्वारा अवश्य 14 जनवरी को एक पुष्पांजली कार्यक्रम आयोजित किया जाने लगा है लेकिन शासन और स्थानीय सामाजिक, राष्ट्रवादी सोच के लोग, राजनेता इसके प्रति सचेत नहीं हुए हैं।
फिर भी सीहोर के इतिहास को मध्य प्रदेश शासन के इतिहास संबंधी विभागों द्वारा विशेष मान्यता तो दी गई लेकिन कभी यहाँ ऐतिहासिक स्मारकों और जीर्ण-शीर्ण हो रहे अवशेषों की तरफ मध्य प्रदेश शासन ने ध्यान नहीं दिया। जबकि सीहोर का इतिहास पूरे देश की जंगे आजादी की लड़ाई में सबसे अमिट और तेजस्वी स्वरूप लिये हुए है।
इस संबंध में उर्दू में प्रकाशित ऐतिहासिक पुस्तक ''सिपाही बहादुर'' जो भोपाल के प्रसिध्द इतिहासकार और स्वतंत्रता संग्राम सैनानी श्री असद उल्ला खाँ साहब द्वारा लिखी गई थी। इस किताब की पृष्ठभूमि में ही स्वयं असलउल्ला खां साहब ने लिखा है कि ''1857 के स्वतंत्रता संग्राम के तूफान के आगे अंग्रेजों के कदम लगभग उखड़ चुके थे और हर तरफ अंग्रेज बेसहारा बनकर बदहवासी में पागलों की तरफ फिर रहे थे, इन परिस्थितियों में भोपाल कन्टिनजेन्ट के बाग़ी सिपाहियों ने 'वली शाह रिसालदार' के नेतृत्व में 6 अगस्त 1857 को सीहोर में अंग्रेजों की सत्ता के खिलाफ बग़ावत का झण्डा बुलंद किया। उन्होने बैरसिया और सीहोर में अंग्रेजों के बंगलों को आग लगा दी। बैरसिया में जो अंग्रेज थे उनको कत्ल कर दिया । सरकारी खजाने लूट लिया । इसके फौरन बाद उन्होने अपनी एक सरकार ''सिपाही बहादुर'' के नाम स्थापित की । उन्होने जगह-जगह इस नई सरकार के झण्डे गाड़ दिये और मुसलमानों, हिन्दुओं से अपील की कि वो इस नई सरकार के हाथ मजबूत करें । उन्होने अपनी सरकार के तहत विभिन्न प्रशासनिक कार्यालय भ्ज्ञी स्थापित करना प्रारंभ कर दिये । भोपाल की बगावत कई एतबार से मध्यभारत और मालवा की बग़ावतों से भिन्न थी क्योंकि भोपाल के बागियों ने भोपाल की बग़ावत को एक बा-मकसद और मजबूत शक्ल देने की समझदार कोशिश की थी । ये एक क्रांतिकारी कदम था जिसमें हिन्दुस्तान से अंग्रेजों को निकालकर शासन की बागडोर हिन्दुस्तानी जनता के हाथों में देने का इरादा सम्मिलित था। इस 'सिपाही बहादुर सरकार' को स्थापित करने वाले सीहोर फौज के चार वतनपरस्त बहादुर अफसर थे। जिस फ़ौज का नाम भोपाल कन्टिनजेंट था। भोपाल राज्य में ये पहली समानान्तर सरकार थी जो अंग्रेजी सरकार के खिलाफ स्थापित हुई थी। जिस समय ये सरकार स्थापित हुई उस वक्त उसके संस्थापक फ़ौज के एक अफसर बाग़ी रिसालदार वली शाह थे। उन्होने इस सरकार की स्थापना के समय बाग़ी फौजियों को रियासत भोपाल के पॉलिटिक एजेन्ट मेजर हैनरी विलियम के कार्यालय जो सीहोर में स्थित था के पास जमा करने के बाद उनके सामने एक वलवला अंगेज और जोशीली तकरीर की थी । वली शाह के साथ तीन अफ़सर जो उस बग़ावत के नेता थे उनके नाम हैं आरिफ शाह, महावीर और रमजू लाल।''
इस प्रकार इतिहास के पृष्ठों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि सीहोर में सिपाही बहादुर सरकार का न केवल गठन हुआ था बल्कि इस बहादुर सरकार ने यहाँ से अंग्रेजों को खदेड़ भी दिया था लेकिन भोपाल रियासत की बेगम की मिली भगत के चलते अंग्रेजों ने सिपाही बहादुर सरकार में शामिल 356 सिपाहियों को गोलियों से उड़ा दिया था। इस संदर्भ में भी देश की विभिन्न ऐतिहासिक किताबों में उल्लेख मिलता है जैसे 'हयाते सिकन्दरी' जिसके संपादक जनरल उबैद उल्ला खाँ, नवाब सुल्तान जहाँ बेगम हैं के पृष्ठ क्रमांक 56, 'भोपाल स्टेट गजेटियर' के पृष्ठ 122 पर सहित अन्य किताबों में भी इस घटना का उल्लेख स्पष्ट रूप से उल्लेखित है।
सिपाही बहादुर सरकार के देशभक्त सैनिकों को सामुहिक रूप से कत्ल कर दिया गया था । ''सिपाही बहादुर'' नामक उर्दू में प्रकाशित ऐतिहासिक पुस्तक में एक जगह स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि ''जनरल रोज़ बहुत तानाशाह व्यक्ति था, इसके अतिरिक्त वह हिन्दुस्तान के राष्ट्रवादियों के खून का प्यासा था। उसने हालात की जानकारी प्राप्त करने के पश्चात यह निर्णय लिया कि बाग़ियों को सजा-ए-मौत दे दी जाये। अत: 14 जनवरी 1858 को सीहोर के सैकड़ो राष्ट्रवादी कैदियों को जेल से निकाला गया और एक मैदान में लाकर खड़ाकर दिया गया । यहाँ उनकी छोटी- छोटी टुकड़ियाँ बनाकर गोलियों से भून डाला गया। इस प्रकार 356 कैदियों को बिना किसी नियमित जाँच के गोलियों से उड़ा दिया गया। इसके अतिरिक्त सैकड़ों कैदियों को सेवा से पृथक किया गया और सीमाओं के बाहर कर दिया गया। इन बहादुर फोजियों ने सजा-ए-मौत से बचने के लिये माफ़ी का कोई निवेदन नहीं किया । उन्होने वतन की आजादी के लिये सरकार से समझौता करने के बजाय अत्याधिक दिलेरी से मौत को गले लगा लिया । इस प्रकार 'सिपाही बहादुर' के दीवानों ने सारी दुनिया को हमेशा के लिये ये रास्ता दिखा दिया कि देश और कौम की आजादी के लिये किस प्रकार सच्चे सिपाही अपनी जानों को भेंट स्वरूप प्रस्तुत करते हैं।''
सीहोर के लिये यह गौरव की बात है कि यहाँ के बहादुर सैनिकों ने 'सिपाही बहादुर' सरकार का गठन कर अंग्रेजों को सीहोर से खदेड़ दिया था और अंत तक अंग्रेजों के आगे वह झुके नहीं। आज भी इन बहादुर सिपाहियों की अनेक समाधियाँ बनी हुई हैं जो अब जीर्ण-शीर्ण स्थिति में आ गई हैं लेकिन मध्य प्रदेश शासन ने कभी इन स्मारकों को सहेजने के लिये इसके प्रति गंभीरता से कदम नहीं उठाये।
स्थानीय जिला प्रशासन ने भी इस तरफ कभी ध्यान नहीं देता। पिछले कुछ समय से बसंत उत्सव समिति द्वारा अवश्य 14 जनवरी को एक पुष्पांजली कार्यक्रम आयोजित किया जाने लगा है लेकिन शासन और स्थानीय सामाजिक, राष्ट्रवादी सोच के लोग, राजनेता इसके प्रति सचेत नहीं हुए हैं।
Monday, January 7, 2008
घबरा कर दुल्हा कार से निकला
आष्टा 5 जनवरी (फुरसत)। इन दिनों आष्टा नगर में शादी-ब्याह की धूम मची है मुस्लिम समाज में शादी-ब्याह चल रहे है कल आष्टा में सीहोर से एक बारात आई रात्री में बाना निकला बाना जब बड़ा बाजार में पहुंचा तो बाने में आगे-आगे डी.जे. सेट व बड़े वाहन में चल रहा था गीतो पर युवक पीछे नाच रहे थे वही पीछे एक फूलो से सजी एम्बोसेडर कार में दूल्हे राजा बैठे थे कार काफी धीरे-धीरे चल रही थी इस कारण इंजन क ाफी गर्म हो गया था तब बड़ा बाजार में इंजन को ठंडा करने के लिए एक युवक ने कार का बेनर खोला और उसमें बीना देखे समझे पानी डाल दिया पानी डालते ही इंजन में से काफी धुआं उठा धूआं देख कार में बैठे दुल्हा राज समझे आग लग गई और वे घबराये और कार का फाटक खोल कार से बाहर आ गये धुआं देख नाच रहे युवक भी कार के पास आ गये और काफी भीड़ जमा हो गई बाद में कुछ दूर दुल्हे राजा पैदल चल के जब कार पुन: चालू हुई तो पुन: दुल्हे राजा कार में बैठे और बाने में शामिल हो गये।
बहु की हत्या के मामले में सास, ससुर पति को आजन्म कारावास की सजा
सीहोर 5 जनवरी (फुरसत)। विद्वान सत्र न्यायाधीश श्री एम.ए. सिध्दिकी साहब ने थाना अहमदपुर के अपराध क्रमांक 1212007 में आरोपीगण राजकुमार पुत्र बलराम, बलराम पुत्र खूबचंद गौर तथा श्रीमति धीपूबाई पत्नि बलराम गौर सभी निवासी ग्राम मानपुरा थाना अहमदपुर जिला सीहोर को दहेज की हत्या का दोषी पाकर भारतीय दण्ड विधान की धारा 498-ए एवं 30434 में आजन्म कारावास की सजा से दंडित कर निर्णय सुनाया है। मामले की पैरवी म.प्र.राय की और से श्री ओ.पी.मिश्रा लोक अभियोजक ने की।
अभियोजन की गाथा संक्षिप्त में इस प्रकार रही कि 17 अगस्त 2007 की भागीरथ गौर पुत्र हरिप्रसाद गौर निवासी ग्राम कचनारिया की सूचना जिसमें उसकी पुत्री राम दुलारी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत को दहेज हत्या का परिणाम बतलाया के आधार पर उसके पति राजकुमार, बलराम तथा श्रीमति धीपूबाई के विरुध्द भारतीय दण्ड विधान की धारा 498ए, 304 बी, 302(34) का अपराध क्रं. 12107 पंजीबध्द किया गया तथा विवेचना के पश्चात अभियोग पत्र न्यायालय में पेश किया गया।
प्रकरण उपार्पित होकर माननीय सत्र न्यायालय को प्राप्त हुआ। उसके बाद अभियोजन ने गवाह प्रस्तुत किये। बचाव पक्ष ने 2 गवाहों को पेश किया। विद्वान सत्र न्यायाधीश श्री सिध्दिकी ने दोनो पक्षों को सुना तथा प्रकरण की समस्त परिस्थितियों पर विचार कर मामला सिध्द दोष पाते हुए धारा 498ए एवं धारा 30234 भादवि में आरोपीगण पति, सास व ससुर को आजन्म कारावास की सजा का फैसला सुनाया जो 40 पृष्ठ का होकर विद्वान न्यायाधीश श्री सिध्दिकी साहब ने लिखा की आरोपीगण ने हत्या कर दहेज प्रताड़ना का अपराध किया है। अभियोजन की और से पैरवी करते हुए श्री ओ.पी.मिश्रा ने अभियोजन का पक्ष रखा। सभी आरोपी गण को आजीवन कारावास का दंड भुगतने के लिये जेल भेजा गया।
अभियोजन की गाथा संक्षिप्त में इस प्रकार रही कि 17 अगस्त 2007 की भागीरथ गौर पुत्र हरिप्रसाद गौर निवासी ग्राम कचनारिया की सूचना जिसमें उसकी पुत्री राम दुलारी की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत को दहेज हत्या का परिणाम बतलाया के आधार पर उसके पति राजकुमार, बलराम तथा श्रीमति धीपूबाई के विरुध्द भारतीय दण्ड विधान की धारा 498ए, 304 बी, 302(34) का अपराध क्रं. 12107 पंजीबध्द किया गया तथा विवेचना के पश्चात अभियोग पत्र न्यायालय में पेश किया गया।
प्रकरण उपार्पित होकर माननीय सत्र न्यायालय को प्राप्त हुआ। उसके बाद अभियोजन ने गवाह प्रस्तुत किये। बचाव पक्ष ने 2 गवाहों को पेश किया। विद्वान सत्र न्यायाधीश श्री सिध्दिकी ने दोनो पक्षों को सुना तथा प्रकरण की समस्त परिस्थितियों पर विचार कर मामला सिध्द दोष पाते हुए धारा 498ए एवं धारा 30234 भादवि में आरोपीगण पति, सास व ससुर को आजन्म कारावास की सजा का फैसला सुनाया जो 40 पृष्ठ का होकर विद्वान न्यायाधीश श्री सिध्दिकी साहब ने लिखा की आरोपीगण ने हत्या कर दहेज प्रताड़ना का अपराध किया है। अभियोजन की और से पैरवी करते हुए श्री ओ.पी.मिश्रा ने अभियोजन का पक्ष रखा। सभी आरोपी गण को आजीवन कारावास का दंड भुगतने के लिये जेल भेजा गया।
छेड़खानी करने वालों को नहीं पकड़ने पर मण्डी हम्माल भड़के
सीहोर 5 जनवरी (फुरसत)। गल्ला मण्डी में काम करने वाले जनता कालोनी निवासी सुरेश ठाकरे मराठा का मोहल्ले में रहना विगत कुछ दिनों यहाँ कुछ अवारा तत्वों ने हराम कर दिया है। उसकी नन्ही बालिका का घर से निकलना आफत हो गई है। हम्मालों ने मिलकर मण्डी थाने में इनकी युवकों के खिलाफ शिकायत कराई थी लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हो पाई।
इस पर आज हम्मालों ने फिर मण्डी थाने पहुँचकर कार्यवाही की मांग की तो पुलिस ने अपने अंदाज में उन्हे समझा दिया। इससे नाराज हम्मालों ने नारेबाजी करते हुए पुलिस अधीक्षक और जिलाधीश तक पहुँचकर ज्ञापन सौंपा उधर मण्डी पुलिस ने चार आरोपियों को पकड़ लिया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार जनता कालोनी निवासी सुरेश ठाकरे मराठा की अवयस्क पुत्री ने जनता कालोनी निवासी मुकेश पुत्र गौरीशंकर , बाबूलाल पुत्र जगदीश रैकवार, नीरज उर्फ अईया रैकवार तथा सतेन्द्र पुत्र गोरीशंकर रैकवार जनता कालोनी के खिलाफ जबरन परेशान करने की शिकायत लिखाई थी। इन पर कार्यवाही नहीं किये जाने पर आज मण्डी के हम्माल एकत्र होकर मण्डी थाने पहुँच गये। जब मण्डी थाने से उन्हे संतोष जनक जबाव नहीं मिला तो वह उखड़ गये और उन्होने एक ज्ञापन तैयार कर पुलिस के खिलाफ नारेबाजी की और पुलिस अधीक्षक तथा जिलाधीश को ज्ञापन सौंप दिया। उधर मण्डी थाना पुलिस ने उपरोक्त चारों आरोपियों को पकड़कर धारा 151 के तहत कार्यवाही की है।
आज इस घटनाक्रम के चलते मण्डी में दोपहर तक हम्माल काम नहीं कर सके और यहाँ काम अवरुध्द रहा।
इस पर आज हम्मालों ने फिर मण्डी थाने पहुँचकर कार्यवाही की मांग की तो पुलिस ने अपने अंदाज में उन्हे समझा दिया। इससे नाराज हम्मालों ने नारेबाजी करते हुए पुलिस अधीक्षक और जिलाधीश तक पहुँचकर ज्ञापन सौंपा उधर मण्डी पुलिस ने चार आरोपियों को पकड़ लिया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार जनता कालोनी निवासी सुरेश ठाकरे मराठा की अवयस्क पुत्री ने जनता कालोनी निवासी मुकेश पुत्र गौरीशंकर , बाबूलाल पुत्र जगदीश रैकवार, नीरज उर्फ अईया रैकवार तथा सतेन्द्र पुत्र गोरीशंकर रैकवार जनता कालोनी के खिलाफ जबरन परेशान करने की शिकायत लिखाई थी। इन पर कार्यवाही नहीं किये जाने पर आज मण्डी के हम्माल एकत्र होकर मण्डी थाने पहुँच गये। जब मण्डी थाने से उन्हे संतोष जनक जबाव नहीं मिला तो वह उखड़ गये और उन्होने एक ज्ञापन तैयार कर पुलिस के खिलाफ नारेबाजी की और पुलिस अधीक्षक तथा जिलाधीश को ज्ञापन सौंप दिया। उधर मण्डी थाना पुलिस ने उपरोक्त चारों आरोपियों को पकड़कर धारा 151 के तहत कार्यवाही की है।
आज इस घटनाक्रम के चलते मण्डी में दोपहर तक हम्माल काम नहीं कर सके और यहाँ काम अवरुध्द रहा।
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